एक और बलात्कार! जम के फैशन करो.. पोस्ट पर चर्चा करते हुए एक महोदय ने प्रश्न उठाया कि फैशन पवित्र या पतित कैसे हो सकता है.. इसी विषय पर चर्चा को आगे बदने के लिए यह लेख लिख रहा हूँ...
पहले फैशन का व्यापक अर्थ समझने का प्रयास करते हैं.. फैशन सीधे तौर पर सोन्दर्य से जुडा है.. और भारतीय संस्कृति के अनुसार तो सौन्दर्य का बहुत महत्व है. जब भी किसी पुराण में देवी- देवताओं कि स्तुति होती है तो उनके सौन्दर्य का व्यापक रूप देखने को मिलता है. कल्पना के सागर में डूब कर उनके रूप साज-सज्जा (फैशन) का वर्णन किया जाता है.. भगवन कृष्ण की सुन्दर सज-सज्जा, मां दुर्गा का भव्य स्वरूप, मां लक्ष्मी के सुंदर आभूषण.. सब फैशन का ही तो रूप हैं.. और ईश्वर से जुडी हर चीज़ पवित्र होती है.. उसी पवित्रता को मनुष्यों द्वारा अपनाया गया है...
वैसे भी देवताओं और दानवों में मुख्य भौतिक अंतर क्या है.. स्पष्ट रूप से साज-सजा अर्थात फैशन ..देवताओं का स्वरूप सुन्दर है, उनकी साज-सज्जा आकर्षक है.. इसलिए वो पवित्र हैं लेकिन इसके विपरीत दानव कुरूप हैं, उनकी साज-सज्जा भयानक है, अतः वे अपवित्र हैं.. यह बात हिन्दू पुराणों में ही नहीं बल्कि हर धर्म के स्वरूप के अनुसार है.
प्रकृति भी सुन्दर है, क्योंकि इसकी साज-सज्जा उपयुक्त है, फिर फैशन कैसे पवित्रता की सीमा के बाहर रखा जा सकता है.यह संभव ही नहीं है. . भाषा के चक्कर में पड़ कर हम कैसे एक ही शब्द के अलग अलग अर्थ ले सकते हैं. हाँ फैशन की भी उसी तरह सीमायें हैं जैसे की हर चीज़ की होती हैं
बिना किसी शंका के फैशन पवित्र है..
Friday, 16 May, 2008
हाँ, फैशन पवित्र होता है...
Saturday, 10 May, 2008
कान पकाऊ महिला सशक्तिकरण..
जेपी आन्दोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण एक नारा लगते थे. 'इनसे नहीं लड़ाई है पुलिस हमारा भाई है' कितना सुखद नारा था.. आजकल कोई भी अगर आगे बदने की, मज़बूत होने की कोशिस करता है तो न जाने क्यों किसी की छाती पर पांव रखकर ही रास्ता बनाता है..
नारी शक्ति मजबूत हो, हम भी यही चाहते हैं लेकिन महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली फौज अनावश्यक रूप से मर्दों को अपना शत्रु मान लेती है. न जाने उन्हें क्यों लगता है की हर समस्या का हल पुरुषों को कोस कर ही निकल सकता है. मुझे इस विचार से चिड होती है.. दुश्मनी बांधकर रास्ता मुश्किल होता है... फिर यहाँ फिर यहाँ घोडा और घास जैसी तो बात है नहीं को दोस्ती नहीं हो सकती.. दरअसल आगे बदने की होड़ मैं उचित रह न मिलने पर लोग गुमराह हो जाते हैं.. यही बात हर जगह लागु है.. महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले लोग आज पुरुषों को गाली निकलते हैं...
ऐसी ही हालत रही तो वो दिन दूर नहीं जब पुरुष सशक्तिकरण की बात करनी पड़ेगी
और ऐसा हो भी रहा है.. कल तक दलितों को आरक्षण की बात होती थी, लेकिन दलितों को आगे लेन के चक्कर मैं अगडों को पीछे धकेल दिया गया और आज गरीब अगडों के लिए भी आरक्षण की बात होती है...
जरा सभंल कर...
Wednesday, 7 May, 2008
आओ नफरत उगायें...
सात आठ साल पहले की बात है. तब मैं आठवीं मैं पढता था. मेरे एक दोस्त ने मुझे राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के बारे में बताया. हम दोनों रोज तडके सुबह उठ कर शाखा में जाने लगे. वहन पर विभिन प्रकार के खेल खेलते, व्यायाम करते, और कहानियाँ सुनते थे. संघ में हम इतना रम गए की मैंने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर दूसरे गाँव में संघ की संध्या शाखा शुरू कर दी. हम दोनों चोरी छुपे, घर वालों को बिना बताए शाम को स्कूटर पर बैठ कर उस गाँव में पहुँच जाते और अपने सहपाठियों और अन्य लड़कों के साथ मिलकर शाखा चलाते थे.. फिर दो महीने की छुट्टियाँ हुई. हमारे संघ के जिलाप्रमुख जी ने हमें कहा कि ७ दिन का प्रशिक्षण शिविर (शिविर का नाम तो मुझे याद नहीं) लगेगा उसमें भाग लो.. मैं तो भाग नहीं ले सका लेकिन मेरे मित्र ने भाग लिया. शिविर के वाद जब मैं उससे मिला तो उसने बताया कि शिविर मैं ऐसी ऐसी कहानियाँ सुने जाती थी कि हमारा खून खौल जाता था और दिल करता था कि अभी बंदूक उठा कर मुसलमानों को मार डालूं..
इस तरह कि कई बाते हुई संघ मेरे दिल से उत्तर गया और मैंने इससे तौबा कर ली.. अब दिल्ली मैं हूँ, मेरे कई दोस्त आज भी हिन्दू मुस्लिम मैं जंग की बातें करते हैं... एक तरफ तो कहते हैं की सब कुछ भगवान् ने बनाया है और फिर उसी के वन्दों में कमी निकलते हैं.. कुछ लोग बचपन मैं ही जहर घोल देते है ताकि नफरत कि फसल उग सके..
Sunday, 4 May, 2008
अम्बुमणि रामदौस सही कहते हैं क्या? ...लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी तो ईमानदार आदमी हैं.
सबसे पहले यह बता दूं कि माना जाता है प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं. अब बात आगे बढाते हैं. आजकल, आजकल ही क्या हमेशा से ही हमारे देश के स्वास्थ्य मंत्री अम्बुमणि रामदौस कि निंदा होती रही है.. खासकर मीडिया में, और आधे से ज्यादा भारत वही सोचता है जो मीडिया कहता है..बाकी भारत सोचता ही नहीं है..और इसके बाद भी अगर कोई बच जाता है तो माना जाता है उसे सोचना ही नहीं आता....
रामदौस सबसे पहले तब चर्चा में आये थे जब उन्होने फिल्मों में धूम्रपान न दिखाने कि बात कही थी... सिफारिश लगभग कबूल भी हो गयी थी, लेकिन केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल हो गया और जैपाल रेड्डी के स्थान पर प्रियरंजन दा को सूचना प्रसारण मंत्री बनाया गया.. और उन्होने सिफारिश मानने से इंकार कर दिया... माना जाता है कि फिल्म जगत में फैसले का विरोध हो रहा था, वैसे भी इस मंत्रालय को कमाई बाला समझा जाता है.. लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...
...अब कुछ दिन पहले भी रामदौस जी ने सुझाव दिया कि फिल्मों में 'जाम' न दिखाएँ जाएं क्योंकि इनका बुरा प्रभाव पड़ता है नई पीड़ी पर... मिडिया ने भी रामदौस का खूब मज़ाक उडाया.. एक बडे पत्रकार ने तो यहाँ तक लिख दिया कि मंत्री जी मुनि हो गए हैं...सूचना प्रसारण मंत्रालय ने भी साफ मना कर दिया लेकिन उस पर तो सवाल उठ ही नहीं सकता क्योंकि प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...
लेकिन मुझे लगता है कि रामदौस जी सही कह रहे हैं... आखिर फिल्मों का बहुत प्रभाव पड़ता है समाज पर.. हर रोज न जाने कितने ही अपराध फिल्मी तरीकों से होते हैं.. हम कैसे भूल सकते हैं कि फिल्मों से ही 'गांधीगिरी' पैदा हुई थी और अभी कुछ दिन पहले 'चक दे इंडिया' भी तो फिल्म का ही प्रभाव था.. गिनाने कि जरूरत नहीं है.... लेकिन प्रिय दा ने सोच समझ कर फैसला किया होगा... क्योंकि प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...
Thursday, 1 May, 2008
राष्ट्रीय शर्म, आतंकवाद और मुसलमानों का शोषण.....!!!
Sunday, 27 April, 2008
कृपया मेरी शंका का समाधान करें?
हिंदी ब्लोगिंग का मतलब क्या है?
ब्लोगिंग जगत में उतर कर बहुत मज़ा आता है, अपनी बात को दुनिया के सामने रखने का मौका है.. किसी भी बात को..!!
लेकिन आज कुछ ब्लोगों पर नज़र डालते समय अहसास हुआ कि ब्लोगिंग व्यापक है.. नाम नहीं लेना चाहता लेकिन बहुत से ब्लोगर हिंदी ब्लोगिंग के इस वर्तमान सवरूप से खुश नहीं है.. मैं समझ पाने में असमर्थ हूँ कि ऐसा क्यों है.. हालांकि हिंदी ब्लोगिंग बहुत आगे बड रही है... फल फूल रही है.. लेकिन फिर भी असमंजस बरकरार है..
कृपया अगर आप मेरी शंका का समाधान कर सकें तो जरूर करें.... हिंदी ब्लोगिंग तो हमरा दिल है.. इसे टूटने नहीं दिया जायेगा.....
Tuesday, 22 April, 2008
दलितों का उद्धारक दलित न रह सका
महान लोगों पर टिप्पणी करने से पूर्व अच्छी तरह से सोच विचार कर लेना चाहिए. क्योंकि इससे विवाद उत्पन्न होते हैं.. और सभ्य लोगों को विवादों से दूर ही रहना चाहिए. बाला साहेब भीमराव अम्बेडकर का नाम जब भी आता है मेरे मन में सिहरन उठती है... लगभग उस समय से जब मैंने अम्बेडकर का नाम पहली बार सुना था.. बचपन में हमे और मेरे कई मित्रों को भी जातिसूचक अपमान सहना पडा है.. लेकिन इसके बाबजूद मुझे अम्बेडकर से कभी सहानुभूति नहीं हुई, न ही मुझे ऐसे लगा की उन्होने दलितों के लिए बहुत कुछ कर दिया हो...
इसके विपरीत गाँधीजी से मुझे लगाव रहा है लेकिन इसका कारण अलग है.. जहाँ तक मेरा मानना है, तो मैं यह सोचता हूँ कि दलित दलित चिल्ला कर कोई भी सिर्फ सहानुभूति प्राप्त कर सकता है बस... दलितों और बाकियों के बीच फर्क सिर्फ तभी समाप्त हो सकता है जब दलित दलित चिल्लाना बंद कर दिया जाए...
लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति को हम कैसे व्यक्ति को हम कैसे दलितों या किसी जाति विशेष का उद्धारक मान सकते हैं जिसने उस जाति विशेष को त्याग लकर अपना धर्म ही बदल लिया हो.. मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों होता है.. मेरी छोटी सी बुद्धि में तो यही बात आती है कि ऐसा व्यक्ति तो हार मान कर मैदान छोड़ गया है..
उस दिन शायद अम्बेडकर जयंती थी.. मैं अपने घर के पास से गुज़र रहा था तो मैंने देखा कि एक राजनितिक दल का छुटभैया नेता अम्बेडकर जी जन्मदिन मना रहा है और उसने अम्बेडकर जी कि फोटो के साथ महात्मा बुद्ध का चित्र भी लगा रखा है.. मुझे बडा अजीब लगा और फिर याद आया कि दलितों के उद्धारक ने तो अपना धर्म बदलकर बोध धर्म अपना लिया था...
Saturday, 19 April, 2008
ओलम्पिक मशाल चली गयी और घाव दे गयी
ओलम्पिक मशाल चली गयी और घाव दे गयी...............एक घटना याद आती है
उस समय राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे. और माननीय प्रधानमंत्री जी ओमान के दौरे पर थे. हमेशा की तरह मीडिया के कुछ पत्रकार भी प्रतिनिमंडल में थे और यात्रा के दौरान एअरपोर्ट पर भारतीय एसपीजी तथा वहन की स्थानीय पोलिश में ठन गयी. बात यूँ हुई की भारतीय मीडिया के समान की निगरानी एसपीजी कर रही थी और वहाँ की पुलिस का यह अधिकार था. वहाँ के एक पुलिस अधिकारी ने एसपीजी से बड़ी नम्रता से कहा कि आप निगरानी छोड़ दें, यह हमारा काम है.. लेकिन जब एसपीजी नहीं मणि तो वो गुस्से में आ गए और कहा कि आपको आपका समान नई दिल्ली में मिल जायेगा और इस तरह उन्होने सुरक्षा अपने हाथ में ले ली.
इस घटना कि याद एक दम ताज़ा हो गयी जब हम मशाल दौड़ देख रहे थे. भारत में पूरी मशाल दौड़ कि निगरानी का काम चीनी कमांडो ने किया.. यहाँ तक कि योजना तक उन्होने बनाई और यह भी उन्होने ही तय किया कि किस व्यक्ति के पास कितनी देर तक मशाल रहेगी.. आज भारतीय एसपीजी उस घटना को भूल गयी और यह कहने का सहस नहीं जुटा पाई कि मशाल जब तक भारत में रहेगी भारत ही सुरक्षा व्यवस्था देखेगा. मतलब भारत के पास मशाल को सुरक्षित रखने कि काबलियत नहीं है शर्मसार हुआ है देश..
Tuesday, 15 April, 2008
प्रियंका का मतलब राजनीति ही नहीं कुछ और भी है!
हर चीज़ के पीछे राजनीति है नहीं होती. लेकिन हमारा मीडिया इतना प्रदूषित हो चुका है कि हर चीज़ पर शक करता है. जब स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी कि हत्या की गयी थी उस समय मैं तो बहुत छोटा था लेकिन हमारे बॉस बताते हैं की वे बहुत ही अच्छे इंसान थे. हमारे संपादक श्री अश्विनी कुमार जी तो राजीव जी के अच्छे मित्र थे. वैसे भी राजीव जी मृत्यु बहुत बड़ी त्रासदी थी.
अब जब इसके कई सालों बाद जब प्रियंका गाँधी ने नलिनी से मुलाकात की है
जो की राजीव गाँधी की हत्या में अआरोपी है तो कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं लेकिन मामले को बड़ी नज़र से देखने की जरूरत है. आम तौर पर पिता से बेटियों से ज्यादा लगाव होता है प्रियंका का भी होगा. और अगर वह अपने पिता के कातिल से मिलती है तो यह उसका निजी मामला है.. राजनीती बिलकुल नहीं होनी चाहिए.
वैसे प्राप्त ख़बरों के अनुसार उनकी मुलाकात बड़ी भावुक मुलाकात थी. पहले दोनों रोई. फिर संवेदनशील बाते हुई. जो बातें वकीलों के सामने हुई वो बेशक सामने आ गयी हों. लेकिन कई बातें उनकी अंतरंग भी थी. और हो सकता है की राजीव जी की हत्या के पीछे मुख्य कारण प्रचलित कारण से अलग हो...
मामले को व्यापक दृष्टि से देखने की जरूरत है.. राजनीती की नहीं . प्रियंका संवेदनशील हैं.. बेटियाँ सम्बेद्नशील होती हैं.. इंसानियत के नाते, लड़का - लाक्द्की की तथाकथित समानता के नाते बस करो..
हम प्रियंका की पहल का स्वागत करते हैं.
Saturday, 12 April, 2008
भारत की ओकात नहीं...भारतीयों की तो है!
मामला तिब्बत का नहीं है. तिब्बत तो मात्र प्रासंगिकता हो गया है.. हालांकि तिब्बतवासियों के लिए मामला जरूर आज़ादी से जुडा है लेकिन भारत के लिए सम्मान से जुडा है.. और सम्मान से बढकर तो कुछ भी नहीं होता है... कुछ भी नहीं. राष्ट्र के सम्मान की लिए सब कुछ किया जा सकता है.. लेकिन कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है जो गंभीरता की सीमाओं को भी पर कर जाती है जैसे कि इस वक्त हो गयी है.
चीनी ओलम्पिक मशाल का दुनिया भर में विरोध हो रहा है.. भारत में भी एक भी आदमी ऐसा नहीं है जो देशभक्त हो और चीन का इस मामले में विरोध न करता हो... वामपंथियों को छोड़ दें. वे इस देश के थे ही नहीं.
फुटबाल खिलाडी भूटिया ने ओलम्पिक मशाल दौड़ में भाग न लेने फैसला सराहनीय है..इस सूची में किरण बेदी जैसी हस्ती भी शामिल हैं. हाँ, आमिर खान का कहना की वे तिब्बत के साथ है लेकिन मशाल दौड़ में भाग लेंगे..बात जचती नहीं है.. उन्हें सफाई देने के लिए मजबूर भी नहीं किया जा सकता है लेकिन हम तब माने अगर वह तिब्बत समर्थन के नारे पुते हुए कपडे पहनकर दौड़ में भाग लें.
सचमुच, हमारे देश के सामने मजबूरी है. दलाईलामा हमारे शरणार्थी हैं. और चीन हमारा ऐसा देश है जिसका हमारी सरकार चाह कर भी विरोध नहीं कर सकते. लेकिन भारतीये दौड़ में भाग न लेकर जरूर चीन का विरोध कर सकते हैं. सरकार ने तो बंद छावनी में दौड़ का आयोजन करने का प्रबंध कर लिया है..
तिब्बत के लिए दुआ.
Monday, 7 April, 2008
एनडीटीवी इंडिया की खबर जो सच दिखाए!!!
भारत में जब टीवी पर कोई 'उस' टाइप का सीन आ जाता है और बडे बुजुर्गों साथ हों तो जल्दी से चैनल बदल दिया जाता है.. कल तक घरों में परिवार के साथ बैठ कर नई फिल्में नहीं देखी जाती थी इसलिए समाचार चैनल चला कर टाइम पास किया जाता था लेकिन आज कल परिवार के साथ बैठ कर देखे जा सकने वाले समाचार चैनल ही कहाँ बचे हैं..
मैं एक अख़बार के दफ्तर मैं बैठ कर खबरें कुतरता हूँ.. इसलिए हमेशा नई ख़बरों की जरूरत रहती है. हमारा कोटा पूरा होता है समाचार एजेंसियों से. लेकिन बाकि कसा पूरी करने के लिए हमेशा सामने टीवी चलता रहता है.. कुछ समय पहले तक खैरियत थी. कोई भी चैनल लगाओ ताज़ा खबरें मिलती थी लकिन आजकल तो अकाल पड़ गया है.. हर समय टीवी पर राखी सावंत के दर्शन होते हैं... या फिर बाहुबली द ग्रेट खली के.. बाकि समय में मर्द के पेट में बच्चा, ज्योतिष, नंगापन और न जाने क्या क्या दिखाई देता है..
इस दौर में भी एनडीटीवी इंडिया एक मात्र ऐसा चिंल है जो अब भी समाचारों में भरोसा करता है.. भले ही एनडीटीवी के संजय अहिरवाल टीआरपी न होने का दुःख जताते हों लेकिन जो भी खबरें देखता है वो सिर्फ एनडीटीवी इंडिया ही देखता है.. और हमारे समाचार पत्र के टीवी पर तो हमेशा एनडीटीवी ही चलता है......
कुछ समय पहले जब दिबांग जी को जिम्मेदारियों से मुक्त करने की खबर आई थी तो मैंने यहाँ विरोध जताया था लेकिन शायद आये सिपहसलार उन नीतियों को भी/ही आगे बडा रहे हैं..
एनडीटीवी को साधुवाद.
Tuesday, 1 April, 2008
लोकतंत्र की कसौटी पर खरा नहीं उतरता डा.कलाम का प्रस्ताव
जनता के राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने कुछ दिन पूर्व एक प्रस्ताव रखा. चूँकि कलाम साहब की सबकी नज़रों में बहुत इज्ज़त है इसलिए सब ने उस प्रस्ताव पर बड़ी गौर से विचार किया. चर्चा पर आगे बढने से पहले जरा एक नज़र प्रस्ताव पर मार लें...
सांसदों का कार्यकाल एक बर्ष बडा दिया जाये तथा बडे हुए बर्ष में उन्हें व्हार्टन या हार्वर्ड में मनैज्मेंट का प्रशिक्षण लेने के लिए भेजा जाये.. ताकि संसद पार्टी के प्रति मोह छोड़ सकें
पहली बात एक कम्पनी को मनेज्मेंट से चाल्या जा सकता है..किसी राष्ट्र को नहीं.. और फिर हमारे देश में तो कामराज और बसंत साठे जैसे नेता हुए है जो अनपढ़ थे परन्तु विश्व के महान प्रशासक साबित हुए हैं.. अकबर और अशोक जैसे सम्राट कभी हारवर्ड नहीं गए..
इतना ही नहीं हमारे देश के नेता हार्वर्ड में जरूर पडा चुके हैं जिनमे लालू यादव भी शामिल हैं..लेकिन तर्क यह नहीं हैं..
तर्क लोकतंत्र से जुडे हैं. भराटी उन चुनदा देशों से है जहाँ समाज के हर तबके को एक साथ वोट देने का अधिकार मिला..जबकि अधिकतर पश्चमी देशों में वोट का अधिकार पाने के लिए क्रांतियाँ हुई..ताकि सीमित लोकतंत्र को ख़त्म किया जा सके.. वैसे भी लोकतंत्र का मतलब होता की लोगों का तंत्र.. संसद अमीन समाज का आइना होना चाहिए ना की चटर-पटर अंग्रेजी बोलने वाले विदेशी दिमाग.. हमे ऐसे लोग चाहिए जो समाज को समझ सकें क्योंकी भारत में ७० प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो दिन में यह समझ पाने में असमर्थ होते हैं की रात को रोटी नसीब होगी की नहीं..
सलाह देना और उसका पालन करना अलग अलग चीजे हैं.. वैसे भी संसद बदलते रहते हैं कितने लोगों को हार्वर्ड भेज कर पैसे फूंकेंगे.. वह लोग वहाँ से भोले-भले लोगों को मूर्ख बनाने के नये गुर ही सीख के आयेंगे... जहाँ तक पार्टी के मोह की बात है तो पार्टी को विचारधारा का प्रतीक माना जाता है
सबसे अच्छा उपाए है की भारत की शिक्षा प्रणाली को दुरुस्त बनया जाये और सबको शिक्षा मिले..
इस प्रस्ताव का कई बुद्धिजीवी लोगों ने विरोध किया है जिन में पत्रकार नीरजा चौधरी भी शामिल हैं..
Saturday, 29 March, 2008
बडे बेआबरू हो कर 'उस' कूचे से हम निकले...
इंसान एक जगह टिक कर नहीं बैठ सकता. और फिर अगर आप मीडिया में हों तब तो कभी एक जगह टिक ही नहीं सकते. और सही भी है आगे बढने का हक तो सभी को है.. में तो अक्सर अपने दोस्तों से कहता हूं की 'छोटे सपने देखना पाप है'...
हुआ यूँ की कुछ दिन पहले मैं एक नई मासिक पत्रिका में इंटरव्यू देने के लिए गया...नाम लेना ठीक नहीं रहेगा लेकिन यह पत्रिका अभी अभी निकल रही है और इसके २ ही अंक निकल पाएं हैं अब तक... खैर, मैं वहाँ इंटरव्यू के लिए पहुंचा.. कुछ देर बाद मेरा इंटरव्यू शुरू हो गया..मैंने उन्हें अपना रिज्युमे दिया.. विभिन पत्र-पत्रिकाओं मैं छपे अपने लेख दिखाए..
फिर उन्होने मेरा रिज्युमे देख कर कहा तो आप इस समाचार पत्र में डेस्क पर काम करते हैं, मैंने जवाब दिया जी हाँ... उन्होने कहा..मतलब आप सब-एडिटर हैं..मैंने कहा, हाँ...उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ... उन्होने हमारे समाचार पत्र के एक वरिष्ठ व्यक्ति का नाम लिया जो डेस्क पर ही हैं.. और पूछा तब तो आप उन्हें जानते होंगे..मैंने कहा हाँ बिलकुल जानता हूँ. फिर उन्होने मुझे कहा की आप उनसे लिखवा कर लाएं तब 'जैसा आप कहेंगे वैसा होगा'......
और फिर ठीक उनके कहे अनुसार लिखित प्रमाण भी मैंने प्रस्तुत करदिया...२ दिन बाद मैं कार्यालय से 'येन केन प्रकारेण' लिखवा कर लाया और पत्रिका को सौंप दिया..लेकिन उन पर कोई असर नहीं.. वे यह मानने को तैयार ही नहीं थे की किसी राष्ट्रिये अख़बार मैं मात्र १९ साल का लड़का उप संपादक बन सकता है..
उनका व्यव्हार मेरा अपमान था.. उनकी गोल मोल बातें मेरी सच्चाई पर चोट थी..
मैं किसी तरह वहाँ से उठ कर आया... लेकिन मेरी भड़ास वहाँ नहीं निकली...यहाँ निकल रही है...
लोग समझते है की वो तरक्की नहीं कर पाए तो कोई भी नहीं कर पायेगा...
Thursday, 27 March, 2008
साथी हाथ बढाना- मिल के 'कूड़ा' उठाना
हमारी परेशानी यह है कि हम हर चीज़ का दोष सरकार पर डाल देते हैं...क्यों न हम भी कूडा उठाएं ..रोज नहीं तो कम कम से सप्ताह में एक दिन.. और कूडा नहीं उठा सकते तो कम से कम कूडा न फैलायें... तभी तो भारत 'भारत' बन पाएगा...
Monday, 24 March, 2008
लौहपुरुष की भविष्यवाणी और झूठ के हसीं सपने
Sunday, 23 March, 2008
ब्लॉगर कौन होता है?
एक सवाल कौंधता है मन में कि ब्लॉगर कौन होता है? लेकिन हर कोई ब्लॉगर भी नहीं होता इसलिए सबसे पूछ भी नहीं सकते...इसलिए सोचा कि यह सवाल ब्लॉगरओं कि बस्ती नैन ही उठाया जाया लेकिन समस्या यह कि ब्लॉगर पूछते हैं कि यह सवाल मन में आया ही क्यों...इसलिए पहले में इस सवाल का जबाब दे दूं..
आज ऑफिस में जब हम लोग लीड न्यूज़ का फैसला कर रहे थे तो महंगाई पर हमारे राजनितिक सवांददाता की भेजी हुई खबर लगाने का फैसला हुआ तो मेरे डेस्क सहयोगी कह रहे थे कि महंगाई आप आदमी को मार जायेगी... तो मैंने सोचा कि शुक्र है कि मैं बच जाऊंगा क्योंकि में आम आदमी नहीं हूँ..मैं तो ब्लॉगर हूँ ना...
फिर बात चली कि सरकारी कर्मचरियों के वेतन भी बदने वालें हैं क्योंकि जल्दी ही वेतन आयोग अपनी सिफारिशें सरकार को सोंपने वाला है लेकिन मैंने फिर सोचा कि मुझे इससे भी कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि मैं तो एक आज ऑफिस में जब हम लोग लीड न्यूज़ का फैसला कर रहे थे तो महंगाई पर हमारे राजनितिक सवांददाता की भेजी हुई खबर लगाने का फैसला हुआ तो मेरे डेस्क सहयोगी कह रहे थे कि महंगाई आप आदमी को मार जायेगी... तो मैंने सोचा कि शुक्र है कि मैं बच जाऊंगा क्योंकि में आम आदमी नहीं हूँ..
फिर बात चली कि सरकारी कर्मचरियों के वेतन भी बदने वालें हैं क्योंकि जल्दी ही वेतन आयोग अपनी सिफारिशें सरकार को सोंपने वाला है लेकिन मैंने फिर सोचा कि मुझे इससे भी कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि मैं तो एक आज ऑफिस में जब हम लोग लीड न्यूज़ का फैसला कर रहे थे तो महंगाई पर हमारे राजनितिक सवांददाता की भेजी हुई खबर लगाने का फैसला हुआ तो मेरे डेस्क सहयोगी कह रहे थे कि महंगाई आम आदमी को मार जायेगी... तो मैंने सोचा कि शुक्र है कि मैं बच जाऊंगा क्योंकि में आम आदमी नहीं हूँ..मैं तो ब्लॉगर हूँ ना...
कई बातें आई और गयी लेकिन मेरी बात कभी नहीं हुई जबकि मैं एक ब्लॉगर हूँ. राजनेता भी कई मुद्दे उछालते हैं..बिहारियों को पीटते हैं, पाकिस्तान और चीन के विरोध मैं भी राजनीती होती है, अमरीका दादागिरी करता है, और भी बहुत कुछ होता है लेकिन ब्लॉगरओं कि बात कोई नहीं करता.... मैंने जब एक 'बुद्धिजीवी' से पुछा तो वह बोला कि ब्लॉगर कौन होता है?
मुझे तो पता नहीं कि ब्लॉगर कौन होता है? आप
