SUNIL DOGRA : मेरी पहचान

>> Thursday, 28 June, 2007

जालिम की दुनिया में आपका बहुत बहुत स्वागत है। यह जॊ जिदंगी का फ़लसफा है ना, बडा नासाज है। अब देखिए इसने मुझ जैसे भॊले भाले (लॊग मुझे भॊला कहते हैं) इन्सान कॊ जालिम बना दिया। वैसे मेरी उम्र बहुत ज्यादा नहीं है इसलिए आपका ज्यादा टाईम खराब नहीं हॊगा।
          सन्त कबीर कह गए हैं कि जिस दिन हम पैदा हए हम हसें जग रॊए, परन्तु हम जिस दिन पैदा हुए उस दिन सब रॊ रहे थे। वॊ इसलिए कि उस दिन मेरे दादाजी (बापू) श्री परमाराम जी मृत्युशय्या पर थे। वैघॊं के अनुसार पल दॊ पल के मेहमान। लॊग बातें करने लगे थे कि यह मनहूस तॊ....। यह दिन था 22 अगस्त 1987 का। पर ईश्वर ने दयालुता दिखाई और बापू मौत कॊ ठेंगा दिखाकर लॊट आए और मेरे घरवालॊं ने मेरा नाम रखा 'लक्की'
हमारे कुटुम्ब में कन्याऒं कॊ बडा स्नेह दिया जाता रहा है। उदाहरण के लिए पिताजी की सात बहने हैं। परन्तु मैं संयुक्त परिवार में लगातार पांचवा पुत्र था और घरवालॊं कॊ लडकी की चाहत थी। अतः घर में कन्या ना हॊने के कारण आरम्भ के वर्षॊं में मेंरा पालन पॊषण कन्या की तरह किया गया। जैसे वे मेरे बालॊं की बडी बडी दॊ चॊटियां बनाते थे, मुझे फ्रॉक पहनाते थे, और भी ना जाने क्या क्या।
            इसी बीच परिवार संयुक्त से एकल हॊ गया। और हमारा पांच लॊगॊं का परिवार मूल निवास से हटकर सगूर नाम के गांव में रहने लगे जहां कुटुम्ब की खेती यॊग्य जमीन थी। परिवार में माता एवं पिताजी के अलावा मेरा बडा भाई है। और छॊटी बहन, पिताजी एचआरटीसी में कार्यरत थे अतः सप्ताह में एक बार ही घर आ पाते थे। वे अक्सर शनिवार की शाम कॊ आते थे और सॊमवार कॊ पौ फटते ही चले जाया करते थे। इसी बीच मुझे सरस्वती विघा मन्दिर नाम के विघालय में दाखिल करवाया गया। एक बदले नाम के साथ। इस बार नाम था सुनील डॊगरा। हां, प्रमाणपत्र में जन्मतिथि भी भिन्न थी जॊ आज मेरी वास्तविक जन्मतिथि कॊ गौण बनाती है। वहां मैंने आठवीं कक्षा में आर्दश भारतीय पब्लिक स्कूल में प्रवेश लिया। सरस्वती विघा मन्दिर में जॊ राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत हुई थी उसे यहां एक मुकाम तक पहुचांने यॊग्य मार्गदर्शन मिला। यहीं पर मैं रामेश्वर नाम के मित्र के प्रभाव में आकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य बना। परन्तु जल्द ही आभास हुआ कि यह स्थान मेरी विचारधारा के अनुसार नहीं है अतः मैने उसे शीघ्र ही त्याग दिया। परन्तु इससे राजनीति में रूचि प्रगाढ हुई। आदरणीय दिबांग जी कॊ देखते हुए पत्रकार बनने का निश्चय किया तथा उन्हे गुरू रूप में स्वीकार किया। इसी बीच राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक पंजाब केसरी के लिए साप्ताहिक राजनैतिक लेख लिखने लगा। मेरे लेख प्रति सॊमवार कॊ 'डॊगरा इन एक्शन' शीर्षक से प्रकाशित हॊते थे।
               मैं सातवीं कक्षा में था तॊ कुछ एसी घटना हुई कि में कॊमा में चला गया। पालमपुर के डॉक्टरॊं नें धर्मशाला स्थानात्नरित कर दिया। वहां भी चार दिन तक जिदंगी और मौत के बीच झूला पर विद्वान डॉक्टर नहीं बता पाए की मुझे क्या हुआ है। इस घटना के बाद पिताजी की कार्यस्थली जसूर में रहने लगे। जसूर पठानकॊट के निकट हिमाचल की सीमा का अन्तिम कस्बा है। विज्ञान विषय से उच्च माध्यमिक कक्षा उर्तीण करने के बाद दिल्ली के एनआरएआई स्कूल आफ मॉस कम्युनिकेशन में पत्रकारिता में स्नातक करने हेतु प्रवेश लिया। अब दिल्ली में किराये के घर में रह रहा हूं। इस चक्कर में तड़के दिन शुरू हो जाता है और रात के चौथे पहर तक सोने का वक्त नहीं मिलता. वैसे भी मुझे नींद से ज्यादा प्यार नहीं है. बाकी जिन्दगी दौड़ रही है और मैं इसे छूने की कोशिश में लगा हूँ. इसी बीच एक एनजीओ में भी काम किया. बाद में अखबार की दुनिया में आ गया. पंजाब केसरी से शुरू कर कुछ दिन अमर उजाला में रहा. आज कल दिल्ली में नवभारत टाइम्स में काम कर रहा हूँ. डेस्क के काम में सूरज ढलने के बाद ही दिन शुरू होता है. इसलिए दिल भर कुछ काम नहीं होता था. मैं वक्त के सही यूज के लिए आगे पढ़ने की सोची. दिल्ली युनीवर्सिटी में अंग्रेजी साहित्य पढ़ने के लिए प्रवेश परीक्षा दी. अब नौकरी के साथ पढ़ाई कर रहा हूँ.


Sunil Dogra
+91-98918-79501 
sunil.dogra21@gmail.com

12 comments:

rajeev jain 8 July 2007 at 12:49 AM  

भई दॊ चीजें खास ताैर पर पसंद आइ। एक तॊ खुद कॊ जालिम लिखना और दूसरा अपना इतिहास इस तरह लिखना की पढने में मजा आए इतनी कम उम में अचछा है।
कीप इट अप

नमस्कार ....रविंदर टमकोरिया(व्याकुल) 16 October 2007 at 10:21 AM  

Bhai Jalim ji...ajab hai aap aur ajab hai aapki jiwan yatra..bahut acha lag raha hai ki aap delhi aaye the ash karne magar yahan aakar Gandhiwadi ho gaye...aage aage dekhye aap kya-kya karte hain...magar yeh wishwas hai mujhe ki aap ka har kadam sahi hoga tatha dusron ko prerna dene wala hoga...best of luck...aapka bhagy aapka saath de..aap ki har sochi hui baat puri ho..

रवीन्द्र रंजन 14 March 2008 at 11:21 AM  

अच्छा लगा आपके बारे में जानकर। शुभकामनाएं।

vijay gaur 22 March 2008 at 11:09 AM  

aapka andaj bhi khoob hai. subh kamnain. likhte rahiye - padne wale betab hain

Dr.Parveen Chopra 7 May 2008 at 10:36 PM  

अपना दिल खोल कर लिखी इस तरह की इंट्रोडक्शन पहली बार नेट पर पढ़ रहा हूं....खुश रहो। दिल्ली में मकान किराये का है तो क्या हुया.....इन परिंदों को भी मिलेगी मंज़िल एक दिन, ये हवा में खुले इन के पंख बोलते हैं।

सुशील कुमार छौक्कर 23 June 2008 at 8:50 PM  

ये जालिम बड़ा जालिम निकला। काश कि ऐसे जालिमों की सख्या बढती जाऐ। अच्छा लगा जालिम से मिलकर। ये जालिम दिलचस्प है। खैर ऐसे जालिमों से तो मिलने का दिल करता है तो अब मुक्कालात(मुकालात) होती रहेगी।

आर्य मनु 26 November 2009 at 7:36 AM  

खम्मा घणी बन्ना सा'

क्या अंदाज़-ए-बयां है आपका भी...मान गए...
बीमारी को डोक्टर नहीं पकड़ paye थे ???? कुछ छुपा रहे हो जालिम...!!!!
वैसे भी अच्छा अच्छा बताया.....जहाँ परेशानी में पड़ सकते थे...उन लम्हों को खूबसूरती से "कुतर" दिया....संपादक साहब को बधाई...
अच्छा लगा आपके बारे में जानकर...
एक बात पुच्नी थी.....
किताब के लिए कितना इंतज़ार करवाओगे ???

आर्य मनु, उदयपुर
ommanuudaipur@gmail.com

Miss 10 April 2010 at 5:17 AM  

aapki ye jalim introduction or likhne ka ye andajhme to sach me bahut pasand aaya.ye jalim dil to kehta hai ki aapki tarif me likhte hi jayen, par hamare likhne se kya hota hai.likhna to aapko hai so keeeeeeeeeeeeeeep it upppppppppppp okkkkkkkkkkkkkkkkkkk (@ @)
$
< >
'

Ravinder Jayalwal 15 November 2011 at 7:34 PM  

कम से कम अपना ईमेल तो कही दिया होता ताकि कोई संपर्क कर सके
रविंदर कुमार
ईमेल : ravindersanjay@gmail.com

SUNIL DOGRA जालि‍म 30 December 2011 at 8:48 AM  

रविंदर जी, ईमेल भी दिया है और फ़ोन नंबर भी. आपके सुझावों का स्वागत है.

sunil.dogr21@gmail.com

Swati 4 March 2012 at 12:34 AM  

Wow... you wrote 'About me' very nicely. Good. And It's wonderful that you came to Delhi to fulfill all your dreams and ambitions. All the very best! Though I know, you don't believe in Gods, but I would wish- God Bless you! :-) Be happy always.

Rao Devilal 21 April 2014 at 8:56 AM  

bhai sahab agr aapke pass shahide aajam sardar bhagat singh pr lekhan ki huyi koi samgri h to pls publish it...

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