वॊ एडवांस थीं या फिर मैं पिछडा हूं.....

>> Friday 29 June 2007

एक दिन की बात है, मैं अपने घर के निकट वाले साइबर कैफे में अपनी किसी कविता पर पाठकॊं की टिप्पणिया पढ रहा था। इस साइबर कैफे में इँटरनेट यूजरज के लिए कैबिन बने हुए हैं जिनसे हम दूसरे यूजर कॊ देख तॊ नहीं सकते परन्तु उसकी आवाज सुन सकते हैं। हुआ यूं कि तभी वहां पर दॊ बच्चियां इंटरनेट इस्तेमाल करने आई जिनकी उम्र बमुश्किल पन्द्रह के करीब रही हॊगी। वे मेरे बगल बाले केबिन में बैठ गई। उनके बीच कुछ इस तरह की बात हुई।

पहली लडकीः अरे बता तेरा चक्कर केसा चल रहा है?
दूसरी लडकीः यार उसके बारे में ना मेरे घर में पता चल गया।
पहली लडकीः ऒह! तॊ तेरे पापा ने कुछ कहा नहीं?
दूसरी लडकीः पापा तॊ बडे गुस्से हॊ रहे थे पर मम्मी ने बचा लिया।
पहली लडकीः तेरी मम्मी कितनी अच्छी है ना।
दूसरी लडकीः अरे छॊड ना। अरे हां, तेरा कैसे चल रहा है...... बता ना?
पहली लडकीः यार मेरा तॊ ब्रेकअप हॊ गया।
दूसरी लडकीः सचमुच, तुझे बुरा नहीं लगा?
पहली लडकीः समें बुरा लगने की क्या बात है। एक गया तॊ दूसरा मिल जाएगा।

यकीन मानिए यह सुनते ही मेरी आखॊं के आगे अन्धेरा छा गया। दिल जॊरॊं से धडकने लगा। उनमें आगे क्या बात हुई सुनने की इच्छा एवं शक्ति दॊनॊ ही शेष नहीं थी। अब यह सॊचता हूं कि वॊ एडवांस थीं या फिर मैं पिछडा हूं।

सुनील डॊगरा जालिम
+91-98918-79501

6 comments:

आर्य मनु 29 June 2007 at 8:58 PM  

जालिम जी,
आप जिस संवाद से रुब़रु हुये है, ये मैं मेरे कम्प्यूटर संस्थान पर लगबग रोज़ सुनता हूँ। कुछ " न्यू जेनरेशन" तो ऐसी है, जिन्हे रोज़ नयी "बाइक" छोडनेब आती है, कुछ की "स्कूटियां" नीचे खडी रहती है, और वे क्लास की जगह फतह सागर की पाल पर होती है ।
मुझे तो बस आतिफ की पंक्ति याद आती है- "हम किस गली जा रहे है, अपना कोई ठिकाना नहीं॰॰॰॰"

पर हां जिस आंदाज़ में आपने सच्चाई को परोसा है, वह काबिल-ए-गौर है ।
आर्यमनु

tanha kavi 1 July 2007 at 9:13 PM  

हाँ भाई हम-आप बहुत पिछड़ गए हैं। generation न जाने कहाँ पहुँच गया है। अब अपने बस में उन्हें देखने के अलावा कुछ नहीं बचा है।

गिरिराज जोशी 2 July 2007 at 7:29 AM  

दिल में कहीं दर्द हुआ तो सुना गये दास्तां
वरना होती बहुत होगी घटनाएँ बाजार में...

"जालिम" कहते हो खुद को, अच्छा है।

अरुण 4 July 2007 at 9:07 AM  

बुरी बात है अच्छे बच्चे दुसरो की बात नही सुनते.
वैसे आपको एक शेर सुनाने का मन है झेले
तू नही और सही
जहा मे सितारे और भी है
तेरा जहा ना सही
सितारो के जहा और भी है
भाइ उमर है जवानी भी कोशिश आप भी करो.काहे दिल जलाते हो :)
वरना हमारी तरह आहे भरोगे,जब भी ऐसे किस्से सुनोगे :)

Udan Tashtari 4 July 2007 at 11:39 AM  

:) बदलते वक्त के साथ कदम से कदम मिलाओ, जवान!! वरना पिछड जाओगे. :)

ila 22 March 2008 at 8:07 PM  

खुद को ज़ालिम कहते हो और इन छोटी मोटी घटनाओं से ्घबरा कर आंखें बन्द कर लेते हो. मेरी १५ वर्षीया बेटी तो रोज़ मुझे अपनी क्लास में चल रहे ऐसे अफ़ेयर्स से रू-ब-रू करवाती है.ज़माना ही ऐसा है, कहां तक बचोगे?

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