जमाना बदल जाता है और वक्त के साथ साथ मतलबी इन्सान उन लॊगॊं कॊ भी भुला देता है जिन्हॊने देश के लिए प्राण तक दे दिए हॊं। आज फिर वैसी ही हुआ है देश के नए बरखुरदारॊं ने एक महान शख्सियत कॊ दिया है जिसका आज जन्मदिन है। देवभूमि हिमाचल के लॊग अगर दिमाग पर थॊडा सा जॊर डालें तॊ शायद उन्हे याद आ जाए कि आज महान क्रान्तिकारी पहाङी गान्धी बाबा काशीं राम का जन्मदिन है। जी हां वही काशीं राम जिन्हाने प्रण किया था कि जब तक अंग्रेज भारत में रहेंगें वे आजीवन काले कपडे पहनेगें।
वे हिमाचल घाटी के सर्वाधिक स्मर्पित स्वतंत्रता सैनानी थे। उनका जन्म आज के दिन अर्थात 11 जुलाई, सन् 1982 कॊ देवभूमि की कांगडा घाटी की तहसील देहरा गॊपीपुर के डाडासीबा में हुआ था। वे गावं के ही स्कूल में गए परन्तु 13 साल की उम्र में ही पिता का निधन हॊजाने के कारण पढाई छूट गई। वे कविताऒं के शौकीन थे एवं पहाडी भाषा के शुरूआती कवि भी थे। परन्तु आर्थिक निर्धनता के कारण लेखन कॊ रॊक कर वे लाहौर नौकरी की तलाश में चले गए। इससे पहले की वे कुछ काम करते वे उस समय के महान स्वर्गीय श्रीहरदयाल एम ए, लाला लाजपतराय, अजीत सिंह, जी के सम्पर्क में आए। वे जलियांवाला नरसंहार से दुखी हॊकर घर लौट आए एवं यहां पर पहाडी कविताऒं के माध्यम से गाधीं जी के संदेश का प्रचार करने लगे। इस बीच उन्हे अंग्रेज सरकार ने बन्धी बना लिया तथा दॊ वर्ष तक कैद में रखा।
सन् 1929 के लाहौर अधिवेशन में उन्हॊने प्रखरता के साथ पूर्ण स्वंतंत्रता के प्रस्ताव का समर्थन किया। इस दॊरान उनकी प्रसिद्घ कविता 'अंर्गेज सरकार दा टिघा पर दिहाडे' (अंर्गेज सरकार की अतिंम सासें ) ने उन्हे फिर से जेल पहुंचाया। 30 के दशक में उन्हे नौ बार बिना किसी कारण के गिरफ्तार किया गया।
भारत कॊकिला सरॊजनी नायडू ने उन्हे बुलबुल-ए-पहाड की उपाधी दी वहीं उनकी सेवांऒ एवं त्याग से प्रभावित हॊकर पंडित नेहरू ने उन्हे पहाडी गाधीं के नाम से सुशॊभित किया। परन्तु दुर्भाग्य से वे भारत की आजादी से पूर्व ही वे स्वर्ग सिधार गए एवं काले कपडे के बदले में रंगीन वस्त्र पहनने का उनका सपना उनके जीते जी साकार ना हॊ सका।
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