बडी ही चौंकाने वाली खबर थी कि दिबांगजी कॊ एनडीटीवी ने पदमुक्त कर दिया। वे एनडीटीवी के हिन्दी चैनल के प्रबंध संपादक थे। विभिन्न सूत्रॊं से मिली खबरॊं के अनुसार उन्हे हटाकर चैनल ने यह कार्यभार संजय अहिरवाल एवं मनीष कुमार कॊ सौंपा है साथ ही मनॊरजंन भारती कॊ राजनीतिक संपादक बना दिया गया है। इस भारी भरकम बदलाब ने मीडिया में फिर अस्थिरता ला दी है।
अरूणाचल प्रदेश के दिबांग मीडिया की लॊकप्रिय हस्ती हैं। उनके द्वारा एंकर किया जाने वाले कार्यक्रम खबरॊं की खबर और मुकाबला बहुत ही मशहूर एवं पुरस्कृत कार्यक्रम रहे हैं। उन्हे इस तरह से हटाने से मीडिया प्रेमियॊं कॊ करारा झटका लगा है। परन्तु मीडिया का एक बडा बर्ग इस फैसले से खुश भी है क्यॊंकि वे सख्त छवि वाले हैं एवं काम में कॊताही उन्हे गुस्सा दिलाती है।
वैसे उन्हे हटाने से जॊ नुकसान चैनल कॊ हॊगा उसकी भरपाई करना कठिन है क्यॊंकि संजय अहिरवाल की दर्शकॊं में पकड नहीं है। जब राजदीप सरदेसाई ने एनडीटीवी छॊडा था उसके बाद उन्हे टक्कर की एंकरिगं का मौका मिला था परन्तु आज यह कार्यक्रम फ्लॉप है। उम्मीद है कि एनडीटीवी दिबांग जी के बिना भी निष्पक्ष पत्रकारिता करेगा।








5 comments:
अच्छे आदमियों की कद्र हर जगह है, NDTV न सही और चैनल तो है ही।
आपकी जानकारी थोड़ी अधूरी है । उन्होने NDTV नही छोड़ा है। वो अभी भी NDTV में बने हुए हैं । हां उन्हें प्रबंध सम्पादक के पद से जरूर हटा दिया गया है
ना तो किसी चैनल को फर्क पड़ता है और ना ही इन लोगों को।
पहले तो दिबांग आज तक पर दिखाई देते थे बाद मे NDTV.
योग्यता कभी छुपती नहीं ।
टीवी चैनलों के कर्मचारी तराज़ू के मेढ़कों की तरह होते हैं। पैसे और शोहरत के लिए आस्थाएं बदलती रहती हैं।
मज़े की बात यह है कि ये सारे तुर्रम ख़ान 'हंस' जैसी पत्रिकाओं में मीडिया के भटकाव का रोना रोते हैं जबकि ये खुद बिकने पर मजबूर हो चुके हैं वरना ऐशो-आराम के लिए दौलत का जुगाड़ कहां से करेंगे। अब कोई गांवों-कस्बों में जाकर छापाखाना खोलकर पत्रकारिता तो करने से रहा।
''हर कोई बिका करता है यहां.. शर्त ये है कि मोल चुपके से बताया जाए''
सीधे स्वीकारिए कि हमें कोई मतलब नहीं सैद्धांतिक पत्रकारिता से बल्कि हम दरख़रीद रक्कासाएं हैं जो सियासी गलियारों में मुजरा करने के लिए हरदम तैयार हैं।
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