ऐसा भी क्या था गाँधी में...

>> Thursday, 2 October, 2008


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जैसे जैसे मैंने होश संभाला, मेरे मन यह प्रशन गहराता गया कि आखिर उस अधनंगे फ़कीर ने ऐसा भी क्या किया था कि उसका इतना नाम हो गया. था क्या उसमें ऐसा..

सचमुच बापू ने जो किया वो सब तो स्यवं भगवान् भी धरती पर नहीं कर सके. जब बापू पढने के लिए इंग्लैंड जाने लगे तो उनकी मां ने उनसे तीन वचन मांगे. मांस नहीं खाओगे, शराब नहीं पियोगे और परायी स्त्री पर बुरी नज़र नहीं डालोगे.. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था. जब बापू समुद्री जहाज में बैठे तो उन्हें पता चला कि पुरे जहाज़ में खाने के लिए कोई शाकाहारी पकवान तो है ही नहीं. पुरे समय में उन्होंने सलाद और मिठाईयां खा कर गुजरा किया. इतना ही नहीं. इंग्लैंड पहुँच कर तो और भी बुरी हालत हो गयी. वहां जिन महोदय के घर वो रहते थे उन्होंने बापू को लाख समझाया कि यहाँ कि ठण्ड का मुकाबला शराब और मांस के बगैर नहीं हो सकता लेकिन बापू अडिग थे. उन्हें भूखे सोना पसंद था लेकिन मांस खाना नहीं.

दक्षिण अफ्रीका में पहुँच कर उन्होंने नमक खाना छोड़ दिया, फिर ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए दूध भी त्याग दिया और भारत लोटने तक कपडे भी छोड़ दिए. वो सिर्फ हाथ से काते सूत के कपडे ही पहनते थे. उन्होंने अन्न का भी त्याग कर दिया और सिर्फ कंद मूल के सहारे रहने लगे. सत्ता का तो उन्हें कभी लोभ था ही नहीं.

बापू कि सबसे अच्छी बात थी कि उन्हें उनके सिद्धांत पता थे. और जीवन भर उन्ही के रस्ते पर चले.. जरा इत्मीनान से सोचिये भला कोई व्यक्ति कैसे सत्य और अहिंसा के सहारे 'सब कुछ' पा सकता है और इस्ससे भी ज्यादा, कैसे यह प्राण निभा सकता है. मिझे यकीन नहीं होता कि कोई भी, जी हाँ कोई भी इंसान ऐसा कर सकता है.. अगर बापू इंसान होते तो शायद बह भी नहीं कर पते वो तो भगवान् थे....

वैष्णव जन तो तेने कहिये,
जे पीड पराई जाणे रे।।

पर दृखे उपकार करे तोये,
मन अभिमान न आणे रे।।

सकल लोकमां सहुने वंदे,
निंदा न करे केनी रे।।

वाच काछ मन निश्चल राखे,
धन-धन जननी तेनी रे।।

समदृष्टी ने तृष्णा त्यागी,
परत्री जेने ताम रे।।

जिहृवा थकी असत्य न बोले,
पर धन नव झाले हाथ रे।।

मोह माया व्यापे नहि जेने,
दृढ वैराग्य जेना मनमां रे।।

रामनाम शुं ताली लागी,
सकल तीरथ तेना तनमां रे।।

वणलोभी ने कपटरहित छे,
काम क्रोध निवार्या रे।।

भणे नरसैयों तेनु दरसन करतां,
कुळ एकोतेर तार्या रे।।

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हमलावर खबरदार! जम्मू भी है तैयार

>> Monday, 4 August, 2008

अक्टूबर १९४७ में जब पाकिस्तानियों ने कश्मीर पर हमला कर दिया. उस समय तक कश्मीर एक अलग देश हुआ करता था. महाराजा हरि सिंह डोगरा के आग्रह पर भारत सरकार ने हमलावरों को रोकने के लिए सेना भेज दी. उस समय कश्मीर जाने वाले सेना के एक बडे अफसर बताते हैं की कश्मीर में हर जगह पोस्टर लगे हुए थे जिन पर लिखा था...



हमलावर खबरदार
कश्मीरी हिन्दू, सिख मुस्लिम हैं तैयार

अब आज इतने साल बाद कश्मीर में अगर जम्मू से भी कोई चला जाये तो उसका बापस आना तय नहीं होता. जवाहर सुरंग जम्मू और कश्मीर को अलग करती है, हिन्दू मुसलमानों को अलग करती है. इतना अलग की फिर वो कभी नहीं मिल पाते.. शायद मरने या शहीद होने के बाद भी नहीं.
राज्य सरकार ने अमरनाथ यात्रा के लिए कुछ जमीन दे दी ताकि यात्रियों को कुछ सुविधाएँ दी जा सकें. पर कश्मीर जल उठा. साथ में जन्नत कही जाने वाली घटी में तिरंगे जल उठे. भारत भूमि पर पाकिस्तानी झंडे लहराए गये. पाकिस्तान के लिए और कश्मीर की आजादी के नारे लगाये गये. आखिर सरकार ने जमीन बापस ले ली. हाँ इसी बीच राज्य सरकार की भी बली दे दी गयी. शायद अल्लाह को या फिर बाबा अमरनाथ को.

लेकिन फिर जम्मू जल उठा. अब तिरंगे लहराने लगे. बाबा अमरनाथ के नारे गूंजने लगे. हाँ, धरती जम्मू की भी लाल हुई ठीक वैसे ही जैसे कश्मीर की लाल हुई थी. खून का मजहब नहीं होता. पर शयद जमीन का होता है. कौन सा? यह मिझे नहीं पता. अगर पता होता तो हिन्दू जमीन हिन्दुओं को दे दी जाती और मुस्लिम जमीन मुसलमानों को... पर अफ़सोस.
खैर, कश्मीरी नेता उमर अब्दुल्ला ने संसद में कहा 'यह हमारी जमीन की लड़ाई और हम लडेंगे. उन्होंने यह भी कहा की वो भारतीय हैं और मुस्लिम हैं' उनकी कुछ बातें गले उतरी और कुछ पर कूटनीतिक सवाल उठ गये..
कुछ भी हो जम्मू के अंदर इतना लावा हो सकता है शायद की किसी ने सोचा था. क्योंकि जम्मू शांत शहर है. और फिर लावा एक दिन में नहीं बनता ..अब तक जम्मू की जो अनदेखी हुई है वो सब लावा बनकर फ़ुट पड़ा है. वैसे भी जब एक शांत शहर अपनी शराफत छोड़ देता है तो ससे खतरनाक कोई नहीं होता..

मुझे नहीं पता गलती किसकी है लेकिन जो हो रहा है ठीक नहीं है. काश भोले बाबा या कोई अल्लाह इन चीखों को सुन कर कुछ करिश्मा कर दे. लेकिन हमने तो यहाँ तक सुना है की ईश्वर भी नहीं होता..

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काश! मैं मुसलमान होता...

>> Tuesday, 1 July, 2008

एक हिन्दू होने के नाते मैं हमेशा जानने का प्रयास करता था कि मुसलमान कैसे होते हैं? लेकिन चूँकि मैं हिमाचल से हूँ और वहाँ मुसलमान न के बराबर होते हैं इसलिए मेरा यह सपना आसानी से पूरा नहीं हो सका. फिर पढाई के लिए दिल्ली आने का मौका मिला तो मुसलमान मित्रों से संपर्क हुआ. लेकिन जब भी धर्म सम्बन्धी चर्चा उठती तो कोई न कोई अड़चन आ जाती. यह तो मैं कभी समझ ही नहीं सका की एक मनुष्य को किस मूल आधार पर हिन्दू या मुसलमान करार दिया जाता है. मैं सबसे यही कह रहा कि कृपया मेरे प्रश्न को हल कर दें

अभी हाल ही में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने का मामला भी खूब भड़का. जम्मू और कश्मीर दो हिस्सों में बाँट गये.. दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी. इस मसले पर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने लिखा 'कश्मीर में १ लाख लोग सड़कों पर बोर्ड को जमीन देने के विरोध में उत्तर आये, वह कश्मीर कि आज़ादी और पाकिस्तान के लिए नारे लगा रहे थे'. बाद में मुझे किसी ने बताया कि वह 'लोग' नहीं थे बल्कि 'मुसलमान' थे. एक अमरनाथ यात्री ने मुझे बताया था कि यह यात्रा तो धार्मिक सदभाव का उत्तम उदाहरण है. यात्री हिन्दू होते हैं और यात्रा में मददगार लोग मुसलमान होते हैं. स्थानीय मुसलमान लोग घोडों, पालकियों और पैदल सामान और यात्रिओं कि सवारी के रूप में मदद कर अपना गुज़ारा चलते हैं...

फिर भी इतना फर्क पैदा हो जाता है कि उम् उनसे नफरत करते हैं. मेरी अल्प विकिसित बुद्धि में यह बात समझ नहीं आती. इसलिए सोचता हूँ कि काश में मुसलमान होता ताकि उनका पक्ष भी समझता. और अपना पक्ष भी देखता और जानने कि कोशिश करता कि समस्या कहाँ है...
अगर आप को पता हो तो कृपया मेरे प्रश्न को हल कर दें

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खबरिया चैनलों को लाइव लड़ाई

>> Sunday, 8 June, 2008

दो समाचार चैनल....एक मुद्दा...
टीवी चैनलों पर आने वालें समाचारों पर तो हँसना न जाने कब से हम सब ने शुरू कर दिया था लेकिन कभी कभी स्थिति ऐसी हो जाती है की यह चैनल नहीं राजनीतिक पार्टियाँ हैं जो एक दूसरे पर कीचड़ उछालना चाहती हैं.... लेकिन अफ़सोस, चैनल तो इस कदर गन्दी हरकतें करते हैं की राजनीतिक पार्टियाँ तो क्या दरिंदे भी शरमा जाएं...
पिछले कल इंडिया टीवी ने एक विडियो दिखाया था और दावा किया था की यह साईं बाबा का विडियो है.. आज फिर उसी चैनल पर खबर आ रही थी की वो विडियो असली नहीं है बल्कि किसी भक्त द्बारा बने गयी एनीमेशन है..
इतने मैं मैंने चैनल बदल कर देखा तो स्टार न्यूज़ में भी वही खबर आ रही थी. और इस तरह से पेश किया जा रहा था की इंडिया टीवी की आलोचना हो.. दूसरी तरफ इंडिया टीवी अपना बचाव कर रहा था

आप तय करें इनकी औकात

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हाँ, फैशन पवित्र होता है...

>> Friday, 16 May, 2008

एक और बलात्कार! जम के फैशन करो.. पोस्ट पर चर्चा करते हुए एक महोदय ने प्रश्न उठाया कि फैशन पवित्र या पतित कैसे हो सकता है.. इसी विषय पर चर्चा को आगे बदने के लिए यह लेख लिख रहा हूँ...

पहले फैशन का व्यापक अर्थ समझने का प्रयास करते हैं.. फैशन सीधे तौर पर सोन्दर्य से जुडा है.. और भारतीय संस्कृति के अनुसार तो सौन्दर्य का बहुत महत्व है. जब भी किसी पुराण में देवी- देवताओं कि स्तुति होती है तो उनके सौन्दर्य का व्यापक रूप देखने को मिलता है. कल्पना के सागर में डूब कर उनके रूप साज-सज्जा (फैशन) का वर्णन किया जाता है.. भगवन कृष्ण की सुन्दर सज-सज्जा, मां दुर्गा का भव्य स्वरूप, मां लक्ष्मी के सुंदर आभूषण.. सब फैशन का ही तो रूप हैं.. और ईश्वर से जुडी हर चीज़ पवित्र होती है.. उसी पवित्रता को मनुष्यों द्वारा अपनाया गया है...

वैसे भी देवताओं और दानवों में मुख्य भौतिक अंतर क्या है.. स्पष्ट रूप से साज-सजा अर्थात फैशन ..देवताओं का स्वरूप सुन्दर है, उनकी साज-सज्जा आकर्षक है.. इसलिए वो पवित्र हैं लेकिन इसके विपरीत दानव कुरूप हैं, उनकी साज-सज्जा भयानक है, अतः वे अपवित्र हैं.. यह बात हिन्दू पुराणों में ही नहीं बल्कि हर धर्म के स्वरूप के अनुसार है.
प्रकृति भी सुन्दर है, क्योंकि इसकी साज-सज्जा उपयुक्त है, फिर फैशन कैसे पवित्रता की सीमा के बाहर रखा जा सकता है.यह संभव ही नहीं है. . भाषा के चक्कर में पड़ कर हम कैसे एक ही शब्द के अलग अलग अर्थ ले सकते हैं. हाँ फैशन की भी उसी तरह सीमायें हैं जैसे की हर चीज़ की होती हैं
बिना किसी शंका के फैशन पवित्र है..

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कान पकाऊ महिला सशक्तिकरण..

>> Saturday, 10 May, 2008

जेपी आन्दोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण एक नारा लगते थे. 'इनसे नहीं लड़ाई है पुलिस हमारा भाई है' कितना सुखद नारा था.. आजकल कोई भी अगर आगे बदने की, मज़बूत होने की कोशिस करता है तो न जाने क्यों किसी की छाती पर पांव रखकर ही रास्ता बनाता है..

नारी शक्ति मजबूत हो, हम भी यही चाहते हैं लेकिन महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली फौज अनावश्यक रूप से मर्दों को अपना शत्रु मान लेती है. न जाने उन्हें क्यों लगता है की हर समस्या का हल पुरुषों को कोस कर ही निकल सकता है. मुझे इस विचार से चिड होती है.. दुश्मनी बांधकर रास्ता मुश्किल होता है... फिर यहाँ फिर यहाँ घोडा और घास जैसी तो बात है नहीं को दोस्ती नहीं हो सकती.. दरअसल आगे बदने की होड़ मैं उचित रह न मिलने पर लोग गुमराह हो जाते हैं.. यही बात हर जगह लागु है.. महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले लोग आज पुरुषों को गाली निकलते हैं...



ऐसी ही हालत रही तो वो दिन दूर नहीं जब पुरुष सशक्तिकरण की बात करनी पड़ेगी
और ऐसा हो भी रहा है.. कल तक दलितों को आरक्षण की बात होती थी, लेकिन दलितों को आगे लेन के चक्कर मैं अगडों को पीछे धकेल दिया गया और आज गरीब अगडों के लिए भी आरक्षण की बात होती है...



जरा सभंल कर...

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अम्बुमणि रामदौस सही कहते हैं क्या? ...लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी तो ईमानदार आदमी हैं.

>> Sunday, 4 May, 2008

सबसे पहले यह बता दूं कि माना जाता है प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं. अब बात आगे बढाते हैं. आजकल, आजकल ही क्या हमेशा से ही हमारे देश के स्वास्थ्य मंत्री अम्बुमणि रामदौस कि निंदा होती रही है.. खासकर मीडिया में, और आधे से ज्यादा भारत वही सोचता है जो मीडिया कहता है..बाकी भारत सोचता ही नहीं है..और इसके बाद भी अगर कोई बच जाता है तो माना जाता है उसे सोचना ही नहीं आता....

रामदौस सबसे पहले तब चर्चा में आये थे जब उन्होने फिल्मों में धूम्रपान न दिखाने कि बात कही थी... सिफारिश लगभग कबूल भी हो गयी थी, लेकिन केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल हो गया और जैपाल रेड्डी के स्थान पर प्रियरंजन दा को सूचना प्रसारण मंत्री बनाया गया.. और उन्होने सिफारिश मानने से इंकार कर दिया... माना जाता है कि फिल्म जगत में फैसले का विरोध हो रहा था, वैसे भी इस मंत्रालय को कमाई बाला समझा जाता है.. लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...

...अब कुछ दिन पहले भी रामदौस जी ने सुझाव दिया कि फिल्मों में 'जाम' न दिखाएँ जाएं क्योंकि इनका बुरा प्रभाव पड़ता है नई पीड़ी पर... मिडिया ने भी रामदौस का खूब मज़ाक उडाया.. एक बडे पत्रकार ने तो यहाँ तक लिख दिया कि मंत्री जी मुनि हो गए हैं...सूचना प्रसारण मंत्रालय ने भी साफ मना कर दिया लेकिन उस पर तो सवाल उठ ही नहीं सकता क्योंकि प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...

लेकिन मुझे लगता है कि रामदौस जी सही कह रहे हैं... आखिर फिल्मों का बहुत प्रभाव पड़ता है समाज पर.. हर रोज न जाने कितने ही अपराध फिल्मी तरीकों से होते हैं.. हम कैसे भूल सकते हैं कि फिल्मों से ही 'गांधीगिरी' पैदा हुई थी और अभी कुछ दिन पहले 'चक दे इंडिया' भी तो फिल्म का ही प्रभाव था.. गिनाने कि जरूरत नहीं है.... लेकिन प्रिय दा ने सोच समझ कर फैसला किया होगा... क्योंकि प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...

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ओलम्पिक मशाल चली गयी और घाव दे गयी

>> Saturday, 19 April, 2008

ओलम्पिक मशाल चली गयी और घाव दे गयी...............एक घटना याद आती है
उस समय राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे. और माननीय प्रधानमंत्री जी ओमान के दौरे पर थे. हमेशा की तरह मीडिया के कुछ पत्रकार भी प्रतिनिमंडल में थे और यात्रा के दौरान एअरपोर्ट पर भारतीय एसपीजी तथा वहन की स्थानीय पोलिश में ठन गयी. बात यूँ हुई की भारतीय मीडिया के समान की निगरानी एसपीजी कर रही थी और वहाँ की पुलिस का यह अधिकार था. वहाँ के एक पुलिस अधिकारी ने एसपीजी से बड़ी नम्रता से कहा कि आप निगरानी छोड़ दें, यह हमारा काम है.. लेकिन जब एसपीजी नहीं मणि तो वो गुस्से में आ गए और कहा कि आपको आपका समान नई दिल्ली में मिल जायेगा और इस तरह उन्होने सुरक्षा अपने हाथ में ले ली.

इस घटना कि याद एक दम ताज़ा हो गयी जब हम मशाल दौड़ देख रहे थे. भारत में पूरी मशाल दौड़ कि निगरानी का काम चीनी कमांडो ने किया.. यहाँ तक कि योजना तक उन्होने बनाई और यह भी उन्होने ही तय किया कि किस व्यक्ति के पास कितनी देर तक मशाल रहेगी.. आज भारतीय एसपीजी उस घटना को भूल गयी और यह कहने का सहस नहीं जुटा पाई कि मशाल जब तक भारत में रहेगी भारत ही सुरक्षा व्यवस्था देखेगा. मतलब भारत के पास मशाल को सुरक्षित रखने कि काबलियत नहीं है शर्मसार हुआ है देश..

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प्रियंका का मतलब राजनीति ही नहीं कुछ और भी है!

>> Tuesday, 15 April, 2008

हर चीज़ के पीछे राजनीति है नहीं होती. लेकिन हमारा मीडिया इतना प्रदूषित हो चुका है कि हर चीज़ पर शक करता है. जब स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी कि हत्या की गयी थी उस समय मैं तो बहुत छोटा था लेकिन हमारे बॉस बताते हैं की वे बहुत ही अच्छे इंसान थे. हमारे संपादक श्री अश्विनी कुमार जी तो राजीव जी के अच्छे मित्र थे. वैसे भी राजीव जी मृत्यु बहुत बड़ी त्रासदी थी.



अब जब इसके कई सालों बाद जब प्रियंका गाँधी ने नलिनी से मुलाकात की है

जो की राजीव गाँधी की हत्या में अआरोपी है तो कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं लेकिन मामले को बड़ी नज़र से देखने की जरूरत है. आम तौर पर पिता से बेटियों से ज्यादा लगाव होता है प्रियंका का भी होगा. और अगर वह अपने पिता के कातिल से मिलती है तो यह उसका निजी मामला है.. राजनीती बिलकुल नहीं होनी चाहिए.
वैसे प्राप्त ख़बरों के अनुसार उनकी मुलाकात बड़ी भावुक मुलाकात थी. पहले दोनों रोई. फिर संवेदनशील बाते हुई. जो बातें वकीलों के सामने हुई वो बेशक सामने आ गयी हों. लेकिन कई बातें उनकी अंतरंग भी थी. और हो सकता है की राजीव जी की हत्या के पीछे मुख्य कारण प्रचलित कारण से अलग हो...
मामले को व्यापक दृष्टि से देखने की जरूरत है.. राजनीती की नहीं . प्रियंका संवेदनशील हैं.. बेटियाँ सम्बेद्नशील होती हैं.. इंसानियत के नाते, लड़का - लाक्द्की की तथाकथित समानता के नाते बस करो..


हम प्रियंका की पहल का स्वागत करते हैं.

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लोकतंत्र की कसौटी पर खरा नहीं उतरता डा.कलाम का प्रस्ताव

>> Tuesday, 1 April, 2008

जनता के राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने कुछ दिन पूर्व एक प्रस्ताव रखा. चूँकि कलाम साहब की सबकी नज़रों में बहुत इज्ज़त है इसलिए सब ने उस प्रस्ताव पर बड़ी गौर से विचार किया. चर्चा पर आगे बढने से पहले जरा एक नज़र प्रस्ताव पर मार लें...

सांसदों का कार्यकाल एक बर्ष बडा दिया जाये तथा बडे हुए बर्ष में उन्हें व्हार्टन या हार्वर्ड में मनैज्मेंट का प्रशिक्षण लेने के लिए भेजा जाये.. ताकि संसद पार्टी के प्रति मोह छोड़ सकें

पहली बात एक कम्पनी को मनेज्मेंट से चाल्या जा सकता है..किसी राष्ट्र को नहीं.. और फिर हमारे देश में तो कामराज और बसंत साठे जैसे नेता हुए है जो अनपढ़ थे परन्तु विश्व के महान प्रशासक साबित हुए हैं.. अकबर और अशोक जैसे सम्राट कभी हारवर्ड नहीं गए..
इतना ही नहीं हमारे देश के नेता हार्वर्ड में जरूर पडा चुके हैं जिनमे लालू यादव भी शामिल हैं..लेकिन तर्क यह नहीं हैं..
तर्क लोकतंत्र से जुडे हैं. भराटी उन चुनदा देशों से है जहाँ समाज के हर तबके को एक साथ वोट देने का अधिकार मिला..जबकि अधिकतर पश्चमी देशों में वोट का अधिकार पाने के लिए क्रांतियाँ हुई..ताकि सीमित लोकतंत्र को ख़त्म किया जा सके.. वैसे भी लोकतंत्र का मतलब होता की लोगों का तंत्र.. संसद अमीन समाज का आइना होना चाहिए ना की चटर-पटर अंग्रेजी बोलने वाले विदेशी दिमाग.. हमे ऐसे लोग चाहिए जो समाज को समझ सकें क्योंकी भारत में ७० प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो दिन में यह समझ पाने में असमर्थ होते हैं की रात को रोटी नसीब होगी की नहीं..

सलाह देना और उसका पालन करना अलग अलग चीजे हैं.. वैसे भी संसद बदलते रहते हैं कितने लोगों को हार्वर्ड भेज कर पैसे फूंकेंगे.. वह लोग वहाँ से भोले-भले लोगों को मूर्ख बनाने के नये गुर ही सीख के आयेंगे... जहाँ तक पार्टी के मोह की बात है तो पार्टी को विचारधारा का प्रतीक माना जाता है

सबसे अच्छा उपाए है की भारत की शिक्षा प्रणाली को दुरुस्त बनया जाये और सबको शिक्षा मिले..

इस प्रस्ताव का कई बुद्धिजीवी लोगों ने विरोध किया है जिन में पत्रकार नीरजा चौधरी भी शामिल हैं..

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बडे बेआबरू हो कर 'उस' कूचे से हम निकले...

>> Saturday, 29 March, 2008

इंसान एक जगह टिक कर नहीं बैठ सकता. और फिर अगर आप मीडिया में हों तब तो कभी एक जगह टिक ही नहीं सकते. और सही भी है आगे बढने का हक तो सभी को है.. में तो अक्सर अपने दोस्तों से कहता हूं की 'छोटे सपने देखना पाप है'...

हुआ यूँ की कुछ दिन पहले मैं एक नई मासिक पत्रिका में इंटरव्यू देने के लिए गया...नाम लेना ठीक नहीं रहेगा लेकिन यह पत्रिका अभी अभी निकल रही है और इसके २ ही अंक निकल पाएं हैं अब तक... खैर, मैं वहाँ इंटरव्यू के लिए पहुंचा.. कुछ देर बाद मेरा इंटरव्यू शुरू हो गया..मैंने उन्हें अपना रिज्युमे दिया.. विभिन पत्र-पत्रिकाओं मैं छपे अपने लेख दिखाए..

फिर उन्होने मेरा रिज्युमे देख कर कहा तो आप इस समाचार पत्र में डेस्क पर काम करते हैं, मैंने जवाब दिया जी हाँ... उन्होने कहा..मतलब आप सब-एडिटर हैं..मैंने कहा, हाँ...उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ... उन्होने हमारे समाचार पत्र के एक वरिष्ठ व्यक्ति का नाम लिया जो डेस्क पर ही हैं.. और पूछा तब तो आप उन्हें जानते होंगे..मैंने कहा हाँ बिलकुल जानता हूँ. फिर उन्होने मुझे कहा की आप उनसे लिखवा कर लाएं तब 'जैसा आप कहेंगे वैसा होगा'......

और फिर ठीक उनके कहे अनुसार लिखित प्रमाण भी मैंने प्रस्तुत करदिया...२ दिन बाद मैं कार्यालय से 'येन केन प्रकारेण' लिखवा कर लाया और पत्रिका को सौंप दिया..लेकिन उन पर कोई असर नहीं.. वे यह मानने को तैयार ही नहीं थे की किसी राष्ट्रिये अख़बार मैं मात्र १९ साल का लड़का उप संपादक बन सकता है..
उनका व्यव्हार मेरा अपमान था.. उनकी गोल मोल बातें मेरी सच्चाई पर चोट थी..

मैं किसी तरह वहाँ से उठ कर आया... लेकिन मेरी भड़ास वहाँ नहीं निकली...यहाँ निकल रही है...
लोग समझते है की वो तरक्की नहीं कर पाए तो कोई भी नहीं कर पायेगा...

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साथी हाथ बढाना- मिल के 'कूड़ा' उठाना

>> Thursday, 27 March, 2008

एक अकेला थक जायेगा
मिल कर 'कूड़ा' हटाना
हमारे यहाँ गंदगी बहुत होती है.. 'हमारे यहाँ' से मतलब है की हर जगह..हिंदुस्तान में.. कुछ माह पहले मुझे सुबह उठ कर पार्क में जाकर टहलने की आदत हुई. वैसे में हिमाचल का रहने वाला हूँ अब दिल्ली में रहता हूँ.. लेकिन हिमाचल में पार्क नहीं होते.. होते हैं तो शहरों में मैं तो गाँव में रहता तय लेकिन हमारा गाँव दिल्ली के पार्क से कहीं बेहतर था.. चारों तरफ बर्फ से ढके पहाड़, साफ सुथरी सड़क, लहलहाते फूल, मदमस्त फसल और कुछ दूर जाकर चाय के शानदार बगीचे भी..खैर, दिल्ली में आकर सुबह उठ कर टहलना शुरू किया जब पहले दिन में गया तो सुबह सुबह सड़क पर घूमने लगा लेकिन यहाँ तो सुबह भी प्रदुषण था...बदबू थी..हमने पडा था की गाँधी जी कहा करते थे की सुबह सुबह हम प्रकृति की ताजी हवा का आनंद ले सकते हैं.. लेकिन मुझे तो वैसी हवा भी नसीब नहीं हुई जैसी मेरे गाँव में दोपहर को चलती थी.. फिर में पार्क में गया.. बहुत से लोग वहाँ व्यायाम, योग आदि कर रहे थे.. लेकिन वहाँ भी गंदगी थी.. मैं वापस आ गया...
अब यही चारा था कि में सुबह न जाऊँ या फिर......
और मैंने दूसरा विकल्प चुना.. मैं अगले दिन एक लिफाफा लेकर गया और पार्क में जाकर कूडा बीनने लगा.. फिर मैं रोज वहाँ जाता.. वहाँ आने वाले लोग मुझे टुकर-टुकर देखते.. कुछ लोगों ने मुझसे पुछा भी..कई ने बेबकूफी कहा, कुछ ने सराहा लेकिन मेरे साथ कूडा किसी ने नहीं उठाया..
मैंने अपनी बात को कुछ मित्रों के आगे रखा.. कुछ ने मेरा साथ भी दिया लेकिन कुछ ही दिन..फिर धीरे धीरे प्रशासन दुरुस्त हुआ और पार्क साफ.. हाँ गंदगी अब भी होती है लेकिन अब अपनी व्यस्तताओं के कारण मैं नहीं जा पता लेकिन फिर भी हालात बेहतर हैं...
हमारी परेशानी यह है कि हम हर चीज़ का दोष सरकार पर डाल देते हैं...क्यों न हम भी कूडा उठाएं ..रोज नहीं तो कम कम से सप्ताह में एक दिन.. और कूडा नहीं उठा सकते तो कम से कम कूडा न फैलायें... तभी तो भारत 'भारत' बन पाएगा...

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तिब्बत की बातें अच्छी नहीं लगती

>> Tuesday, 18 March, 2008

एक बार की बात है. तिब्बत नाम का कोई देश हुआ करता था. फिर एक बार चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया...और वहां के धर्मगुरु दलाईलामा को निवासित करके देश से निकाल दिया... और फिर हमेशा की तरह बडे दिल वाले भारत ने उन्हें शरण दी..

लेकिन जैसा की कहा जाता है ना सोने के पिंजरे में बंद पक्षी से जंगल में मोजूद पक्षी कहीं खुश होता है... कहने का मतलब है किया आज़ादी सबको प्यारी होती है..

बात यह है की भारत में लोकतंत्र है चीन में नहीं..वहाँ गणतंत्र है..कोई अबज़ उठता है तो उसकी आवाज़ तोपों की अबाज़ के आगे खामोश हो जाती है...या खामोश कर दी जाती है..

मैं मूलतः हिमाचल प्रदेश का रहने वाला हूँ..धर्मशाला ज्यादा दूर नहीं है मेरे घर से..वहीं पर तिब्बत सरकार और तिब्बती लोगों का बसेरा है..मुद्दे बहुत हैं...सोचा जाए तो लामा लोगों को तो बिहार में रहना चाहिए क्योंकि बुध भगवान वहीं के थे... परन्तु वे तो हिमाचल में रहते हैं..साथ ही वहां कोई उन्हें पराया भी नहीं कहता जबकि मुम्बई में तो 'लोग' अपने ही देशवासीयों को नहीं बख्शते हैं...खैर छोडिये...बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी...

अभी कुछ दिन पहले चीन ने तिब्बत में सैंकडों लोगों को मार डाला हालाकि रिपोर्ट में कहा गया की मात्र १० लोग ही मारे गए हैं...आज़ादी का आन्दोलन तेज हो चुका है ..लेकिन तय है की उसे दबा दिया जाएगा...
मैं आपसे पूछता हूँ की क्या आप समर्थन करते हैं इस आन्दोलन का... जबाब देने से पहले याद रखियेगा की भारत में भी कई जगह आज़ादी के आन्दोलन चल रहे हैं..फिर पैमाना तो एक ही होता है ना..

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सर्वजीत से अफ़ज़ल का वास्ता!

>> Sunday, 16 March, 2008

खबर है कि पाकिस्तान कि जेल में बंद सर्वजीत को काल कोठरी में डाल दिया गया है.. मतलब उसकी फंसी कि सजा तय है..वैसे 'डेथ वारंट' भी जारी कर दिया गया है....
अब जरा खबर के पह्लुयों पर नज़र डाली जाए. सर्वजीत वहाँ बम धमाके के आरोप में बंद है..आरोप साबित हो चूका है..माफीनामा नामंजूर कर दिया गया है..अभियुक्त को काल कोठरी मैं डाल दिया गया और भारत में सियासत तेज हो चुकी है..मन जाता है कि सर्वजीत बेकसूर है और उसकी बहने और परिवार वाले लगातार प्रयत्न कर रहे है कि वह छूट जाए लेकिन बड़ते वक्त के साथ हालत मुश्किल भी नज़र आ रहे हैं..इतिहास गवाह है कि जब बात पाकिस्तान कि होती है तो सबका खून खौला जाता है.. इस बार भी ऐसा ही हो ढ़ग है..बचाव पक्ष वालों का कहना है कि सर्वजीत तो रास्ता भूल कर बोर्डर पार कर गया और नामुरादों के हाथ चढ़ गया.. साथ ही उसकी बहन कि 'युवराज' राहुल गाँधी से मुलाकात भी इस बात को ज़ाहिर करती है कि कुछ तो हो सकता है...

लेकिन जिंदगी इतनी आसान भी नहीं है...एक पल के लिए सर्वजीत को भूल कर जरा सोचिये कि क्या हम किसी बम बिस्फोट के अपराधी को छोड़ सकते हैं..नहीं ना....सुनने में कड़वा लगता है लेकिन अफ़ज़ल का मुद्दा भी ऐसा ही तो है...फर्क बस इतना है कि वह गद्दार हिन्दुस्तानी है जबकि सर्वजीत पाकिस्तान के लिए गैर मुल्खी है..

मामला सीधा सा है पाकिस्तानी इतने नरमदिल नहीं कि उसे छोड़ दें हाँ भारतीयों से जरूर उम्मीद कि जा सकती है क्योंकि इससे पहले भी तो हमारे एक विदेश मंत्री कुछ 'लोगों' को कंधार छोड़ कर आये थे.. होता रहता है...आखिर उन 'बेचारों' ने भारत की बढती हुई आबादी पर लगाम लगाने कि ही तो कोशिस कि थी.
खैर, वैसे बडे लोगों की छोटी दुनिया में तो चर्चा है की सोदेबजी हो सकती है अफ़ज़ल और सर्वजीत के लिए..
उनका खुदा और हमारा खुदा 'रहम' करे...

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महिला जो बनी महान!

>> Friday, 14 March, 2008

21वीं शताब्दी में भी भारत जैसे देश में एक औरत का आगे बदना बहुत कठिन होता है..भारत में ही क्यों कहीं भी. फिर बात अमरीका की हो या कहीं और की. लेकिन मैं आज एक ऐसी महिला की बात लेकर आया हूँ जो सचमुच ही आम से महान बन गयी है..

आज उस औरत ने एक ऐसा मुकाम पाया है जो कभी कोई नहीं पा सका..वो क्या है मैं बाद में बताऊंगा...उस महिला ने यूरोप के एक देश में जन्म लिया..यूरोप में ही शिक्षा प्राप्त की...फिर प्रेम विवाह किया....लेकिन एक दुसरे देश के आदमी के साथ..वो आदमी एक महान नाम से जुदा था लेकिन इस बारे में उस महिला को खबर नहीं थी... शादी के बाद वो 'हिंदुस्तान' आ गयी क्योंकि उसकी शादी एक हिन्दुस्तानी से हुई..वो लड़का भारत से जो था...लेकिन जिंदगी बहुत कठिन होती है...शादी के लिए उसने अपने यूरोपियन मन-बाप को तो मना लिया लेकिन मुसीबतों का असली दौर तो अभी बाकि था...शादी के लगभग १५-१६ साल बाद उसकी सास ने उसी की गोद में प्राण त्याग दिए...आंतकवादियों ने मार डाला...इसके कुछ ही साल बाद बेचारी के पति को भी मार डाला गया.. उस पर तो मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पडा...वो गुमनाम हो गयी.. लोग उसे भूल भी गए..शायद सोचा होगा कि वो लौट गयी होगी 'अपने' देश..लेकिन उसके लिए तो अब हिंदुस्तान ही उसका देश था..आखिर हो भी क्यों इसी के लिए तो वह अपना धर्म, देश छोड़ कर यहाँ आई थी.

उसके पति के साथियों ने उस पर बहुत दबाब डाला कि वो 'काम' संभल कर सब दुरुस्त करे..लेकिन उसका मन नहीं मान रहा था..... आप बताएं उसे 'काम' संभल लेना चाहिए था ना..

लेकिन उसे अपना मन बदलना पडा जब उसके काम ना सँभालने का असर पूरे देश पर पड़ने लगा..फिर उसने कमान अपने हाथों में ली और निकल पड़ी मैदान में..लेकिन लोगों ने उस अबला पर विदेशी होने कि तोहमत लगाई.. लेकिन उसने हार नहीं मणि और जब उसे अपार सफलता मिली तो उसने एक महान त्याग करते हुए 'फूलों के सेज ठुकरा दी...इस महिला का नाम मैंने ऊपर इसलिए नही बताया ताकि मुझ पर राजनीती कि मोहर ना लगा दी जाए.. सोनिया गाँधी को दस साल हो गए कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर...यह भी एक रिकार्ड है...

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100 साल की उम्र में उठ गयी अर्थी....

>> Tuesday, 11 March, 2008

भारतीय हाकी
1928-2008
चक दे इंडिया का नारा जब लगा था तब हम बहुत खुश हुए थे...हों भी क्यों न आखिर तब हमने फुटबाल जीता, क्रिकेट जीता, और हाकी...... जिस खेल के लिए यह नारा लगा वो .. हाकी शायद हमारा राष्ट्रीय खेल भी है... शायद इसलिए क्योंकि हमने सिर्फ पढा हे या सुना है कि हाकी हमारा राष्ट्रीय खेल है। कभी भी आभास हीं हुआ. कि सचमुच हाकी हमारा राष्ट्रीय खेल है। हां सुना जरूर हे कि कभी ध्यानचन्द जैसे भी खिलाडी थे जो इतने खतरनाक थे की हिटलर जैसे तानाशाह ने उन्हें अपनी सेना में मार्शल बनने को कह दिया...इतना ही नहीं उनकी हाकी में ऐसी 'चुम्बक' थी की गेंद उसी से चिपकी रहती थी. लेकिन अब लगता है जैसे यह कहानिया झूठी हों..मुझे तो विश्वास ही नहीं होता की १९२८ से हम स्वर्ण पदक जीतते आ रहे हैं वो भी ओलम्पिक में.. लगता है की हाकी का नाम मिस-प्रिंट हो गया होगा इसी वजह से हम इसे राष्ट्रिय खेल कहते हैं...
हुआ यह की १०० साल पहले हाकी का जन्म हुआ था जब भारत ने स्वर्म पदक जीता था नीदरलैंड को हरा कर... लेकिन अब ब्रिटेन से ओलम्पिक क्वालिफायिंग मैच में ही हार कर हाकी ने प्राण त्याग दिए हैं..आखिर कब तक झेलती हाकी बेचारी बूदी तो सत्तर के दशक में ही हो चुकी थी ...लेकिन जान लगा कर १९८२ में फिर ओलम्पिक जीता...उसके बाद बीमार पड गयी...और आज मर गयी..
जो लोग कहते हैं क्रिकेट ने हाकी को मार डाला चिढ है मुझे ऐसे लोगों से...
जब हाकी में जित मिलती थी न तब हाकी लोगों की प्यारी थी..हर घर में रोटी बनाने के लिए आटा बाद में मिलता था हाकी पहले.. हाकी की खेती होती थी..जालंधर के पास एक गाँव से १२ खिलाडी निकले थे.. रही बात प्रायोजकों की तो वो भी बहुत थे उस समय के लिहाज़ से..हिटलर तक हमारे खिलाडियों को ललचाते थे..
पिछले कल जब यह खबर आई तो सारा रुख 'गिल' के इस्तीफे पर चला गया हाकी की दुर्दशा तो वहीं रह गयी..
समस्या एक ही है..राष्ट्रीय खेल.. छीन लो दर्जा..
शर्म आती है..

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स्त्री और पुरुष बराबर नही हो सकते.......

>> Friday, 7 March, 2008

लड़का-लड़की एक समान यह बात हमारी किताबों में बहुत लिखी रहती है..लेकिन आज के दौर में अन्याय बन चुकी है. आज महिला दिवस पर मैंने सोचा की बात कह ही दी जाए जिसको मन में में दबाये रखा था मैंने काफी वक्त से.

हर बार महिलाओं को आगे बदने की बात होती है लेकिन दुर्भाग्य यही की सिर्फ बात होती है.... ऐसा नही है की तरक्की नही हुई है...बेशक हुई है लेकिन परेशानी बरकरार है...आज के २१वीं सदी में जब हम बातें करतें हैं बड़ी बड़ी लेकिन हकीकत कुछ और ही है..... आज भी हरियाणा जैसे तथाकथित उन्नत राज्यों में भ्रूण हत्या होती है....पंजाब में बुरी हालत होती है... लेकिन कानून ....एक किस्सा है... मैं हिमाचल से हूँ ...वहाँ के कुल १२ में से ६ जिले ऐसे हैं जहाँ लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा है...सरकार ने वहाँ कानून बनाया है की कन्या भ्रूण हत्या 'हत्या' के बराबर का अपराध है... लेकिन दूसरा पहलु भी है...आज के दौर में भी अगर लोगों की मानसिकता तुछ है तो फिर यह शर्म की बात है....और यह लोग और कोई नही हम ही हैं....

लेकिन फालतू का शोर भी अच्छा नही होता...महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले चोर समाजसेवक भूल जातें है इसका दोष किसी और पर थोपना ठीक नही है......आज दैनिक हिंदुस्तान में एक शीर्षक दिया गया है इसी मुद्दे पर जो अमरीका चुनाव और हिलेरी से जुड़ा है... लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूँ की हम केवल इस आधार पर किसी को 'नेता' नही बना सकते की वो महिला है...

हो सकता की आपका मानसिकता अलग हो लेकिन सच्चाई तो यही है... हाँ आप यह जरूर कह सकते है की जब हमने अपराधियों को नेता बना दिया तो महिला को भी बन सकते हैं...ख्याल तो इस बात का भी रखना चाहिए कि जैसे हम आज महिलाओं का पक्ष लेते हैं कल को मामला पलट न जाए..
वैसे जैसा मैंने शीर्षक दिया है महिला और पुरुष बराबर नही हो सकते...खासकर हमारी संस्कृति के अनुसार...जहाँ महिला पूज्य है...पुरुष से कहीं ऊपर है.

पता नही कैसे महिला की अबला कह दिया गया...

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एक बिहारी सौ बीमारी...

>> Wednesday, 5 March, 2008

' एक बिहारी - सौ बीमारी,
दो बिहारी - लड़ाई की तैयारी,
तीन बिहारी - ट्रेन हमारी,
पांच बिहारी - सरकार हमारी,
चक दे फट्टे
बिहारी भगाओ - पंजाब बचाओ'
तथाकथित बूढा शेर ऊज्ही हरकतों पे आ गया है. आये भी क्यों न बोधा होने के बाद भी भूख तो लगती ही है. और इस तथाकथित शेर की औलाद तो इस काबिल है नहीं की उसे खिला सके इसलिए उसे ही कुछ करना पड़ेगा.....
लेकिन चाचा भतीजे की इस जंग ने देश को सर्वनाश की और धकेलने की तयारी कर दी है.... कल तक यह लोग मुसलमानों की कौम के खिलाफ 'फतवे' निकाला करते थे और वे बिहारियों के खिलाफ काला जहर फैला रहे हैं...
लेकिन कभी सोचा भी होगा उन्होने कि क्यों बिहार के छोटे से गाँव में रहना वाला गरीब आदमी हजारों किलोमीटर दूर अपमानित होने के लिए आजाता है....
लेकिन वे क्यों सोचने लगें उन्हें क्या पता कि 'मातोश्री' कि नींव के निचे कितने बिहारियों का खून छिड़का गया होगा तब जाकर कहीं उनकी भगवा पोशाक बनी होगी.... अपने सिंहाशन पर बेड कर वे कहते हैं कि हम एक कैमरे पर interview नहीं देते...दो कैमरे लेकर आओ......
उनकी तो छोडिये उन्होने तो जीवन भर लोगों का खून ही पिया है... यह जो बिहारी रहनुमा है न उन्ही कि वजह से एक बिहारी को अपमान का घूँट पीना पड़ता है....
मैं मूलत: हिमाचल का रहने वाला हूँ.... हमारे यहाँ दैनिक मजदूरी ९० रुपये है.... उसपर स्थानीय मजदूर नोऊ बजे आये अहं और पांच बजे चले जाते हैं और दोपहर को उन्हें खाना चाहिए इतना ही नहीं दिन में कई बार चाए पिलानी पड़ती है यानी कुल मिला कर ४-५ घंटे ही काम होता है लेकिन इससे कहीं कम दाम पर अगर बिहारी भाई १४-१५ घंटे काम कर दें तो हम उन्ही से काम करवाएंगे ना.....
कभी कोई मिले आपको बिहारी तो पूछना क्यों आगये हो इधर, वो बेचारा बता भी नहीं पाएगा कि क्यों मैं दरभंगा के छोटे से गाँव से भाग आया क्योंकि कमाऊ बाप को नक्सलियों ने मार दिया और मुआवजा पेंशन कोई नेता चारे में मिला कर खा गया...... जमीन 'समाजसेवकों' ने 'दान' में ले ली....अब सोचता हूँ कि आत्मा और शरीर को साथ रख सकूं इसलिए यहाँ आ गया....
बिहारियों कि सबसे बड़ी परेशानी यही ki उनके नेताओं ने गरीबी दूर तो कि लेकिन सिर्फ अपनी....काश वे भी 'मराठी' होते....ऐसा कोई गरीब कहता होगा कि किडनी चोर 'डाक्टर अमित' को भिअभी पकडा जाना था वर्ना हम भी अपनी किडनी बेच कर बिहार चले जात्ते....
बिहारियों कि परेशानी यही कि उनके नेताओं ने गरीबी दूर तो लेकिन सिर्फ अपनी...
काश वे भी मराठी होते...

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रोते तो अब भी हैं वे बदनसीब .....पर अब आखों से आसूं नहीं निकलते!

>> Tuesday, 4 March, 2008

सियासतदानों को सियासत से फुरसत नहीं,
उन कम्बख्तों को रोने से वक्त नहीं मिलता,
बात जब निकलती है तो दूर तलक जाती है. आप सब ने सुना है ही होगा की पाकिस्तान की जेल में ३५ बर्षों से बंद कश्मीर सिंह को रिहा कर दिया है. इससे पहले उन्हें मौत की सजा सुना दी गयी थी लेकिन किस्मत ने साथ दिया और रिहा हो गए. लेकिन जानते हैं ऐसे कितने ही लोग वहाँ बंद हैं. अनगिनत. १९९९ और १९७१ के युध्बंदियों को तो छोडो १९६५ के कई युध्बंदी सड़ कर मर भी गए पाकिस्तान की जेलों में....
सन् १९७१ के ५७ युध्बंदियों की बात तो कभी खुली ही नहीं जिन्हें पाकिस्तान की जेलों में बंद किया गया है... याद तो होगा ही आपको की कैसे दोमुंहे सांप की तरह पाकिस्तान ने युध्बंधियों के परिजनों को न्योता दिया की आकर चेक कर लें पाकिस्तान की जेलों में की हैं यहाँ उनके परिजन या नहीं,,,,, लेकिन उन्हें जेलों में जाने ही नहीं दिया गया बल्कि जेलों के रजिस्टर दिखा कर विदा कर दिया गया की यहाँ उनके रिश्तेदार नहीं हैं...
उन लोगों की तो छोडे जो ज्ञात कैदी हैं अरे भाई कई हजारों अज्ञात कैदी भी हैं वहाँ की जेलों में...जो बेचारे आम आदमी हैं भारत के... जिनका कोई नहीं है...और अगर कोई है भी तो वो इतना लाचार की अगर उन्हें छुड़ाने के लिए दिल्ली दरबार तक भी गुहार लगाने की सोचे तो भी नामुमकिन लगता है......उदहारण के लिए मान लीजिये की पठानकोट (गुरदासपुर, पंजाब) से गुम हुए किसी आदमी का परिजन कोई आदमी जो गरीब है अगर दिल्ली आना चाहे तो किराया लगता है २५० रूपए मतलब की एक सप्ताह की कमाई ....और सोचिये की दिल्ली आना मतलब एक सप्ताह भर तक मजदूरी न कर पाना....मतलब घर के बच्चों का शमशान जाना तय .....
पंजाब राजस्थान और गुजरात के कई हजारों लोग ऐसे ही बदनसीब हैं.... हाँ इस सूची में कश्मीर के लोग नहीं हैं क्योंकि वहाँ लोग लापता नहीं होते.....बंदूक का निशाना बनते हैं.... कभी वोबंदूक चलाने वाले हाथ पाकिस्तानी फौज के होते हैं तो कभी आतंकवादियों के.....और कभी 'किसी और के'
सच है गरीब आदमी को जीने का कोई अधिकार नहीं है,,, खासकर सीमा के पास ..दोस्ती तो हम चाहतें है पाकिस्तान से लेकिन कम्ब्खत वोट मांगने वाले भिखारी कभी कारगिल करवाते हैं तो कभी कभी शानदार डीलक्स होटलों के बंद कमरों में कबाब और बोतलों के साथ तथाकथित शिखर वार्ता करते हैं......
इज्ज़त किसी भी नहीं है... न तो जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कहने वालों की न ही हिंदुस्तान के साथ १००० साल तक लड़ने की बात कहने वालों की....लेकिन पिसना जनता को है... मरना 'शहीदों' को है.... वो पिसते रहेंगे ..मरते रहेंगे....और वाघा बार्डर पर दो मुल्खों की दोस्ती के नारे लगते रहेंगे...

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उत्तर भारतीयॊं की बात पर यूपी-बिहार वालॊं के पेट में क्यॊं दर्द हॊता है?

>> Monday, 11 February, 2008

चूकिं मैं स्वयं भी पत्रकारिता के पेशे से जुडा हूं इसलिए कहते हुए शर्म भी आती है कि टीवी मीडिया ने सब कुछ तबाह कर दिया है। दिन भर बंदर कुत्ते दिखाने वाले यह चैनल हद से ज्यादा गुजर चुके हैं। आलम यह है कि पत्रकारिता खत्म हॊने के कगार पर है। आज वैश्याऒं के घर में न्यमज चैनल चलाए जाते हैं जहां पहले मुजरे हुए करते थे।
एसा ही कुछ पिछले दिनॊं हुआ जब दिल्ली के उपराज्यपाल ने राजधानी में एक मॊटरसाईकिल रैली कॊ शुरू करते हुए कहा कि उत्तर भारत में लॊग कानून तॊडना समझते हैं जबकि दक्षिण भारत में कानून कॊ अधिक जवज्जॊ दी जाती है। समाचार चैनलॊं ने बयान की एसी र्दुगति की कि खन्ना साहब जैसे आसमान से ही गिर पडे हॊं। मीडिया में कहा गया कि उपराज्यपाल ने कहा है कि उत्तर भारतीय कानून तॊडना शान समझते हैं। अब सॊचिए शब्दॊं के इस खून ने क्या कर दिया।
कहना नहीं चाहिए परन्तु सत्य तॊ यही है कि खबरिया चैनलॊं में यूपी-बिहार के लॊगॊं का वर्चस्व हे जिससे वे जिस चाहे उस अंदाज में खबरॊं कॊ मॊड देते हैं। उन्हे लगता है कि मात्र वही उत्तर भारतीय हैं जबिक उत्तर भारत में तॊ पंजाब दिल्ली हरियाणा हिमाचल और उत्तराखंड तक आते हैं। दुर्भाग्य से यूपी-बिहार के नेताऒं ने अपने पेट भरे और जनता का खूब शॊषण किया जिससे वे ना सिर्फ बाहर जाकर काम करने कॊ मजबूर हुए अपितु गरीब भी बने रहे। वास्तव में यही विवाद की वजह बनी हुई है। लगता है कि उत्तर भारतीयॊं की परिभाषा भंग हॊ चुकी है।

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