बडे बेआबरू हो कर 'उस' कूचे से हम निकले...

>> Saturday 29 March 2008

इंसान एक जगह टिक कर नहीं बैठ सकता. और फिर अगर आप मीडिया में हों तब तो कभी एक जगह टिक ही नहीं सकते. और सही भी है आगे बढने का हक तो सभी को है.. में तो अक्सर अपने दोस्तों से कहता हूं की 'छोटे सपने देखना पाप है'...

हुआ यूँ की कुछ दिन पहले मैं एक नई मासिक पत्रिका में इंटरव्यू देने के लिए गया...नाम लेना ठीक नहीं रहेगा लेकिन यह पत्रिका अभी अभी निकल रही है और इसके २ ही अंक निकल पाएं हैं अब तक... खैर, मैं वहाँ इंटरव्यू के लिए पहुंचा.. कुछ देर बाद मेरा इंटरव्यू शुरू हो गया..मैंने उन्हें अपना रिज्युमे दिया.. विभिन पत्र-पत्रिकाओं मैं छपे अपने लेख दिखाए..

फिर उन्होने मेरा रिज्युमे देख कर कहा तो आप इस समाचार पत्र में डेस्क पर काम करते हैं, मैंने जवाब दिया जी हाँ... उन्होने कहा..मतलब आप सब-एडिटर हैं..मैंने कहा, हाँ...उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ... उन्होने हमारे समाचार पत्र के एक वरिष्ठ व्यक्ति का नाम लिया जो डेस्क पर ही हैं.. और पूछा तब तो आप उन्हें जानते होंगे..मैंने कहा हाँ बिलकुल जानता हूँ. फिर उन्होने मुझे कहा की आप उनसे लिखवा कर लाएं तब 'जैसा आप कहेंगे वैसा होगा'......

और फिर ठीक उनके कहे अनुसार लिखित प्रमाण भी मैंने प्रस्तुत करदिया...२ दिन बाद मैं कार्यालय से 'येन केन प्रकारेण' लिखवा कर लाया और पत्रिका को सौंप दिया..लेकिन उन पर कोई असर नहीं.. वे यह मानने को तैयार ही नहीं थे की किसी राष्ट्रिये अख़बार मैं मात्र १९ साल का लड़का उप संपादक बन सकता है..
उनका व्यव्हार मेरा अपमान था.. उनकी गोल मोल बातें मेरी सच्चाई पर चोट थी..

मैं किसी तरह वहाँ से उठ कर आया... लेकिन मेरी भड़ास वहाँ नहीं निकली...यहाँ निकल रही है...
लोग समझते है की वो तरक्की नहीं कर पाए तो कोई भी नहीं कर पायेगा...

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साथी हाथ बढाना- मिल के 'कूड़ा' उठाना

>> Thursday 27 March 2008

एक अकेला थक जायेगा
मिल कर 'कूड़ा' हटाना
हमारे यहाँ गंदगी बहुत होती है.. 'हमारे यहाँ' से मतलब है की हर जगह..हिंदुस्तान में.. कुछ माह पहले मुझे सुबह उठ कर पार्क में जाकर टहलने की आदत हुई. वैसे में हिमाचल का रहने वाला हूँ अब दिल्ली में रहता हूँ.. लेकिन हिमाचल में पार्क नहीं होते.. होते हैं तो शहरों में मैं तो गाँव में रहता तय लेकिन हमारा गाँव दिल्ली के पार्क से कहीं बेहतर था.. चारों तरफ बर्फ से ढके पहाड़, साफ सुथरी सड़क, लहलहाते फूल, मदमस्त फसल और कुछ दूर जाकर चाय के शानदार बगीचे भी..खैर, दिल्ली में आकर सुबह उठ कर टहलना शुरू किया जब पहले दिन में गया तो सुबह सुबह सड़क पर घूमने लगा लेकिन यहाँ तो सुबह भी प्रदुषण था...बदबू थी..हमने पडा था की गाँधी जी कहा करते थे की सुबह सुबह हम प्रकृति की ताजी हवा का आनंद ले सकते हैं.. लेकिन मुझे तो वैसी हवा भी नसीब नहीं हुई जैसी मेरे गाँव में दोपहर को चलती थी.. फिर में पार्क में गया.. बहुत से लोग वहाँ व्यायाम, योग आदि कर रहे थे.. लेकिन वहाँ भी गंदगी थी.. मैं वापस आ गया...
अब यही चारा था कि में सुबह न जाऊँ या फिर......
और मैंने दूसरा विकल्प चुना.. मैं अगले दिन एक लिफाफा लेकर गया और पार्क में जाकर कूडा बीनने लगा.. फिर मैं रोज वहाँ जाता.. वहाँ आने वाले लोग मुझे टुकर-टुकर देखते.. कुछ लोगों ने मुझसे पुछा भी..कई ने बेबकूफी कहा, कुछ ने सराहा लेकिन मेरे साथ कूडा किसी ने नहीं उठाया..
मैंने अपनी बात को कुछ मित्रों के आगे रखा.. कुछ ने मेरा साथ भी दिया लेकिन कुछ ही दिन..फिर धीरे धीरे प्रशासन दुरुस्त हुआ और पार्क साफ.. हाँ गंदगी अब भी होती है लेकिन अब अपनी व्यस्तताओं के कारण मैं नहीं जा पता लेकिन फिर भी हालात बेहतर हैं...
हमारी परेशानी यह है कि हम हर चीज़ का दोष सरकार पर डाल देते हैं...क्यों न हम भी कूडा उठाएं ..रोज नहीं तो कम कम से सप्ताह में एक दिन.. और कूडा नहीं उठा सकते तो कम से कम कूडा न फैलायें... तभी तो भारत 'भारत' बन पाएगा...

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तिब्बत की बातें अच्छी नहीं लगती

>> Tuesday 18 March 2008

एक बार की बात है. तिब्बत नाम का कोई देश हुआ करता था. फिर एक बार चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया...और वहां के धर्मगुरु दलाईलामा को निवासित करके देश से निकाल दिया... और फिर हमेशा की तरह बडे दिल वाले भारत ने उन्हें शरण दी..

लेकिन जैसा की कहा जाता है ना सोने के पिंजरे में बंद पक्षी से जंगल में मोजूद पक्षी कहीं खुश होता है... कहने का मतलब है किया आज़ादी सबको प्यारी होती है..

बात यह है की भारत में लोकतंत्र है चीन में नहीं..वहाँ गणतंत्र है..कोई अबज़ उठता है तो उसकी आवाज़ तोपों की अबाज़ के आगे खामोश हो जाती है...या खामोश कर दी जाती है..

मैं मूलतः हिमाचल प्रदेश का रहने वाला हूँ..धर्मशाला ज्यादा दूर नहीं है मेरे घर से..वहीं पर तिब्बत सरकार और तिब्बती लोगों का बसेरा है..मुद्दे बहुत हैं...सोचा जाए तो लामा लोगों को तो बिहार में रहना चाहिए क्योंकि बुध भगवान वहीं के थे... परन्तु वे तो हिमाचल में रहते हैं..साथ ही वहां कोई उन्हें पराया भी नहीं कहता जबकि मुम्बई में तो 'लोग' अपने ही देशवासीयों को नहीं बख्शते हैं...खैर छोडिये...बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी...

अभी कुछ दिन पहले चीन ने तिब्बत में सैंकडों लोगों को मार डाला हालाकि रिपोर्ट में कहा गया की मात्र १० लोग ही मारे गए हैं...आज़ादी का आन्दोलन तेज हो चुका है ..लेकिन तय है की उसे दबा दिया जाएगा...
मैं आपसे पूछता हूँ की क्या आप समर्थन करते हैं इस आन्दोलन का... जबाब देने से पहले याद रखियेगा की भारत में भी कई जगह आज़ादी के आन्दोलन चल रहे हैं..फिर पैमाना तो एक ही होता है ना..

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सर्वजीत से अफ़ज़ल का वास्ता!

>> Sunday 16 March 2008

खबर है कि पाकिस्तान कि जेल में बंद सर्वजीत को काल कोठरी में डाल दिया गया है.. मतलब उसकी फंसी कि सजा तय है..वैसे 'डेथ वारंट' भी जारी कर दिया गया है....
अब जरा खबर के पह्लुयों पर नज़र डाली जाए. सर्वजीत वहाँ बम धमाके के आरोप में बंद है..आरोप साबित हो चूका है..माफीनामा नामंजूर कर दिया गया है..अभियुक्त को काल कोठरी मैं डाल दिया गया और भारत में सियासत तेज हो चुकी है..मन जाता है कि सर्वजीत बेकसूर है और उसकी बहने और परिवार वाले लगातार प्रयत्न कर रहे है कि वह छूट जाए लेकिन बड़ते वक्त के साथ हालत मुश्किल भी नज़र आ रहे हैं..इतिहास गवाह है कि जब बात पाकिस्तान कि होती है तो सबका खून खौला जाता है.. इस बार भी ऐसा ही हो ढ़ग है..बचाव पक्ष वालों का कहना है कि सर्वजीत तो रास्ता भूल कर बोर्डर पार कर गया और नामुरादों के हाथ चढ़ गया.. साथ ही उसकी बहन कि 'युवराज' राहुल गाँधी से मुलाकात भी इस बात को ज़ाहिर करती है कि कुछ तो हो सकता है...

लेकिन जिंदगी इतनी आसान भी नहीं है...एक पल के लिए सर्वजीत को भूल कर जरा सोचिये कि क्या हम किसी बम बिस्फोट के अपराधी को छोड़ सकते हैं..नहीं ना....सुनने में कड़वा लगता है लेकिन अफ़ज़ल का मुद्दा भी ऐसा ही तो है...फर्क बस इतना है कि वह गद्दार हिन्दुस्तानी है जबकि सर्वजीत पाकिस्तान के लिए गैर मुल्खी है..

मामला सीधा सा है पाकिस्तानी इतने नरमदिल नहीं कि उसे छोड़ दें हाँ भारतीयों से जरूर उम्मीद कि जा सकती है क्योंकि इससे पहले भी तो हमारे एक विदेश मंत्री कुछ 'लोगों' को कंधार छोड़ कर आये थे.. होता रहता है...आखिर उन 'बेचारों' ने भारत की बढती हुई आबादी पर लगाम लगाने कि ही तो कोशिस कि थी.
खैर, वैसे बडे लोगों की छोटी दुनिया में तो चर्चा है की सोदेबजी हो सकती है अफ़ज़ल और सर्वजीत के लिए..
उनका खुदा और हमारा खुदा 'रहम' करे...

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महिला जो बनी महान!

>> Friday 14 March 2008

21वीं शताब्दी में भी भारत जैसे देश में एक औरत का आगे बदना बहुत कठिन होता है..भारत में ही क्यों कहीं भी. फिर बात अमरीका की हो या कहीं और की. लेकिन मैं आज एक ऐसी महिला की बात लेकर आया हूँ जो सचमुच ही आम से महान बन गयी है..

आज उस औरत ने एक ऐसा मुकाम पाया है जो कभी कोई नहीं पा सका..वो क्या है मैं बाद में बताऊंगा...उस महिला ने यूरोप के एक देश में जन्म लिया..यूरोप में ही शिक्षा प्राप्त की...फिर प्रेम विवाह किया....लेकिन एक दुसरे देश के आदमी के साथ..वो आदमी एक महान नाम से जुदा था लेकिन इस बारे में उस महिला को खबर नहीं थी... शादी के बाद वो 'हिंदुस्तान' आ गयी क्योंकि उसकी शादी एक हिन्दुस्तानी से हुई..वो लड़का भारत से जो था...लेकिन जिंदगी बहुत कठिन होती है...शादी के लिए उसने अपने यूरोपियन मन-बाप को तो मना लिया लेकिन मुसीबतों का असली दौर तो अभी बाकि था...शादी के लगभग १५-१६ साल बाद उसकी सास ने उसी की गोद में प्राण त्याग दिए...आंतकवादियों ने मार डाला...इसके कुछ ही साल बाद बेचारी के पति को भी मार डाला गया.. उस पर तो मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पडा...वो गुमनाम हो गयी.. लोग उसे भूल भी गए..शायद सोचा होगा कि वो लौट गयी होगी 'अपने' देश..लेकिन उसके लिए तो अब हिंदुस्तान ही उसका देश था..आखिर हो भी क्यों इसी के लिए तो वह अपना धर्म, देश छोड़ कर यहाँ आई थी.

उसके पति के साथियों ने उस पर बहुत दबाब डाला कि वो 'काम' संभल कर सब दुरुस्त करे..लेकिन उसका मन नहीं मान रहा था..... आप बताएं उसे 'काम' संभल लेना चाहिए था ना..

लेकिन उसे अपना मन बदलना पडा जब उसके काम ना सँभालने का असर पूरे देश पर पड़ने लगा..फिर उसने कमान अपने हाथों में ली और निकल पड़ी मैदान में..लेकिन लोगों ने उस अबला पर विदेशी होने कि तोहमत लगाई.. लेकिन उसने हार नहीं मणि और जब उसे अपार सफलता मिली तो उसने एक महान त्याग करते हुए 'फूलों के सेज ठुकरा दी...इस महिला का नाम मैंने ऊपर इसलिए नही बताया ताकि मुझ पर राजनीती कि मोहर ना लगा दी जाए.. सोनिया गाँधी को दस साल हो गए कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर...यह भी एक रिकार्ड है...

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100 साल की उम्र में उठ गयी अर्थी....

>> Tuesday 11 March 2008

भारतीय हाकी
1928-2008
चक दे इंडिया का नारा जब लगा था तब हम बहुत खुश हुए थे...हों भी क्यों न आखिर तब हमने फुटबाल जीता, क्रिकेट जीता, और हाकी...... जिस खेल के लिए यह नारा लगा वो .. हाकी शायद हमारा राष्ट्रीय खेल भी है... शायद इसलिए क्योंकि हमने सिर्फ पढा हे या सुना है कि हाकी हमारा राष्ट्रीय खेल है। कभी भी आभास हीं हुआ. कि सचमुच हाकी हमारा राष्ट्रीय खेल है। हां सुना जरूर हे कि कभी ध्यानचन्द जैसे भी खिलाडी थे जो इतने खतरनाक थे की हिटलर जैसे तानाशाह ने उन्हें अपनी सेना में मार्शल बनने को कह दिया...इतना ही नहीं उनकी हाकी में ऐसी 'चुम्बक' थी की गेंद उसी से चिपकी रहती थी. लेकिन अब लगता है जैसे यह कहानिया झूठी हों..मुझे तो विश्वास ही नहीं होता की १९२८ से हम स्वर्ण पदक जीतते आ रहे हैं वो भी ओलम्पिक में.. लगता है की हाकी का नाम मिस-प्रिंट हो गया होगा इसी वजह से हम इसे राष्ट्रिय खेल कहते हैं...
हुआ यह की १०० साल पहले हाकी का जन्म हुआ था जब भारत ने स्वर्म पदक जीता था नीदरलैंड को हरा कर... लेकिन अब ब्रिटेन से ओलम्पिक क्वालिफायिंग मैच में ही हार कर हाकी ने प्राण त्याग दिए हैं..आखिर कब तक झेलती हाकी बेचारी बूदी तो सत्तर के दशक में ही हो चुकी थी ...लेकिन जान लगा कर १९८२ में फिर ओलम्पिक जीता...उसके बाद बीमार पड गयी...और आज मर गयी..
जो लोग कहते हैं क्रिकेट ने हाकी को मार डाला चिढ है मुझे ऐसे लोगों से...
जब हाकी में जित मिलती थी न तब हाकी लोगों की प्यारी थी..हर घर में रोटी बनाने के लिए आटा बाद में मिलता था हाकी पहले.. हाकी की खेती होती थी..जालंधर के पास एक गाँव से १२ खिलाडी निकले थे.. रही बात प्रायोजकों की तो वो भी बहुत थे उस समय के लिहाज़ से..हिटलर तक हमारे खिलाडियों को ललचाते थे..
पिछले कल जब यह खबर आई तो सारा रुख 'गिल' के इस्तीफे पर चला गया हाकी की दुर्दशा तो वहीं रह गयी..
समस्या एक ही है..राष्ट्रीय खेल.. छीन लो दर्जा..
शर्म आती है..

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स्त्री और पुरुष बराबर नही हो सकते.......

>> Friday 7 March 2008

लड़का-लड़की एक समान यह बात हमारी किताबों में बहुत लिखी रहती है..लेकिन आज के दौर में अन्याय बन चुकी है. आज महिला दिवस पर मैंने सोचा की बात कह ही दी जाए जिसको मन में में दबाये रखा था मैंने काफी वक्त से.

हर बार महिलाओं को आगे बदने की बात होती है लेकिन दुर्भाग्य यही की सिर्फ बात होती है.... ऐसा नही है की तरक्की नही हुई है...बेशक हुई है लेकिन परेशानी बरकरार है...आज के २१वीं सदी में जब हम बातें करतें हैं बड़ी बड़ी लेकिन हकीकत कुछ और ही है..... आज भी हरियाणा जैसे तथाकथित उन्नत राज्यों में भ्रूण हत्या होती है....पंजाब में बुरी हालत होती है... लेकिन कानून ....एक किस्सा है... मैं हिमाचल से हूँ ...वहाँ के कुल १२ में से ६ जिले ऐसे हैं जहाँ लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा है...सरकार ने वहाँ कानून बनाया है की कन्या भ्रूण हत्या 'हत्या' के बराबर का अपराध है... लेकिन दूसरा पहलु भी है...आज के दौर में भी अगर लोगों की मानसिकता तुछ है तो फिर यह शर्म की बात है....और यह लोग और कोई नही हम ही हैं....

लेकिन फालतू का शोर भी अच्छा नही होता...महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले चोर समाजसेवक भूल जातें है इसका दोष किसी और पर थोपना ठीक नही है......आज दैनिक हिंदुस्तान में एक शीर्षक दिया गया है इसी मुद्दे पर जो अमरीका चुनाव और हिलेरी से जुड़ा है... लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूँ की हम केवल इस आधार पर किसी को 'नेता' नही बना सकते की वो महिला है...

हो सकता की आपका मानसिकता अलग हो लेकिन सच्चाई तो यही है... हाँ आप यह जरूर कह सकते है की जब हमने अपराधियों को नेता बना दिया तो महिला को भी बन सकते हैं...ख्याल तो इस बात का भी रखना चाहिए कि जैसे हम आज महिलाओं का पक्ष लेते हैं कल को मामला पलट न जाए..
वैसे जैसा मैंने शीर्षक दिया है महिला और पुरुष बराबर नही हो सकते...खासकर हमारी संस्कृति के अनुसार...जहाँ महिला पूज्य है...पुरुष से कहीं ऊपर है.

पता नही कैसे महिला की अबला कह दिया गया...

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एक बिहारी सौ बीमारी...

>> Wednesday 5 March 2008

' एक बिहारी - सौ बीमारी,
दो बिहारी - लड़ाई की तैयारी,
तीन बिहारी - ट्रेन हमारी,
पांच बिहारी - सरकार हमारी,
चक दे फट्टे
बिहारी भगाओ - पंजाब बचाओ'
तथाकथित बूढा शेर ऊज्ही हरकतों पे आ गया है. आये भी क्यों न बोधा होने के बाद भी भूख तो लगती ही है. और इस तथाकथित शेर की औलाद तो इस काबिल है नहीं की उसे खिला सके इसलिए उसे ही कुछ करना पड़ेगा.....
लेकिन चाचा भतीजे की इस जंग ने देश को सर्वनाश की और धकेलने की तयारी कर दी है.... कल तक यह लोग मुसलमानों की कौम के खिलाफ 'फतवे' निकाला करते थे और वे बिहारियों के खिलाफ काला जहर फैला रहे हैं...
लेकिन कभी सोचा भी होगा उन्होने कि क्यों बिहार के छोटे से गाँव में रहना वाला गरीब आदमी हजारों किलोमीटर दूर अपमानित होने के लिए आजाता है....
लेकिन वे क्यों सोचने लगें उन्हें क्या पता कि 'मातोश्री' कि नींव के निचे कितने बिहारियों का खून छिड़का गया होगा तब जाकर कहीं उनकी भगवा पोशाक बनी होगी.... अपने सिंहाशन पर बेड कर वे कहते हैं कि हम एक कैमरे पर interview नहीं देते...दो कैमरे लेकर आओ......
उनकी तो छोडिये उन्होने तो जीवन भर लोगों का खून ही पिया है... यह जो बिहारी रहनुमा है न उन्ही कि वजह से एक बिहारी को अपमान का घूँट पीना पड़ता है....
मैं मूलत: हिमाचल का रहने वाला हूँ.... हमारे यहाँ दैनिक मजदूरी ९० रुपये है.... उसपर स्थानीय मजदूर नोऊ बजे आये अहं और पांच बजे चले जाते हैं और दोपहर को उन्हें खाना चाहिए इतना ही नहीं दिन में कई बार चाए पिलानी पड़ती है यानी कुल मिला कर ४-५ घंटे ही काम होता है लेकिन इससे कहीं कम दाम पर अगर बिहारी भाई १४-१५ घंटे काम कर दें तो हम उन्ही से काम करवाएंगे ना.....
कभी कोई मिले आपको बिहारी तो पूछना क्यों आगये हो इधर, वो बेचारा बता भी नहीं पाएगा कि क्यों मैं दरभंगा के छोटे से गाँव से भाग आया क्योंकि कमाऊ बाप को नक्सलियों ने मार दिया और मुआवजा पेंशन कोई नेता चारे में मिला कर खा गया...... जमीन 'समाजसेवकों' ने 'दान' में ले ली....अब सोचता हूँ कि आत्मा और शरीर को साथ रख सकूं इसलिए यहाँ आ गया....
बिहारियों कि सबसे बड़ी परेशानी यही ki उनके नेताओं ने गरीबी दूर तो कि लेकिन सिर्फ अपनी....काश वे भी 'मराठी' होते....ऐसा कोई गरीब कहता होगा कि किडनी चोर 'डाक्टर अमित' को भिअभी पकडा जाना था वर्ना हम भी अपनी किडनी बेच कर बिहार चले जात्ते....
बिहारियों कि परेशानी यही कि उनके नेताओं ने गरीबी दूर तो लेकिन सिर्फ अपनी...
काश वे भी मराठी होते...

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रोते तो अब भी हैं वे बदनसीब .....पर अब आखों से आसूं नहीं निकलते!

>> Tuesday 4 March 2008

सियासतदानों को सियासत से फुरसत नहीं,
उन कम्बख्तों को रोने से वक्त नहीं मिलता,
बात जब निकलती है तो दूर तलक जाती है. आप सब ने सुना है ही होगा की पाकिस्तान की जेल में ३५ बर्षों से बंद कश्मीर सिंह को रिहा कर दिया है. इससे पहले उन्हें मौत की सजा सुना दी गयी थी लेकिन किस्मत ने साथ दिया और रिहा हो गए. लेकिन जानते हैं ऐसे कितने ही लोग वहाँ बंद हैं. अनगिनत. १९९९ और १९७१ के युध्बंदियों को तो छोडो १९६५ के कई युध्बंदी सड़ कर मर भी गए पाकिस्तान की जेलों में....
सन् १९७१ के ५७ युध्बंदियों की बात तो कभी खुली ही नहीं जिन्हें पाकिस्तान की जेलों में बंद किया गया है... याद तो होगा ही आपको की कैसे दोमुंहे सांप की तरह पाकिस्तान ने युध्बंधियों के परिजनों को न्योता दिया की आकर चेक कर लें पाकिस्तान की जेलों में की हैं यहाँ उनके परिजन या नहीं,,,,, लेकिन उन्हें जेलों में जाने ही नहीं दिया गया बल्कि जेलों के रजिस्टर दिखा कर विदा कर दिया गया की यहाँ उनके रिश्तेदार नहीं हैं...
उन लोगों की तो छोडे जो ज्ञात कैदी हैं अरे भाई कई हजारों अज्ञात कैदी भी हैं वहाँ की जेलों में...जो बेचारे आम आदमी हैं भारत के... जिनका कोई नहीं है...और अगर कोई है भी तो वो इतना लाचार की अगर उन्हें छुड़ाने के लिए दिल्ली दरबार तक भी गुहार लगाने की सोचे तो भी नामुमकिन लगता है......उदहारण के लिए मान लीजिये की पठानकोट (गुरदासपुर, पंजाब) से गुम हुए किसी आदमी का परिजन कोई आदमी जो गरीब है अगर दिल्ली आना चाहे तो किराया लगता है २५० रूपए मतलब की एक सप्ताह की कमाई ....और सोचिये की दिल्ली आना मतलब एक सप्ताह भर तक मजदूरी न कर पाना....मतलब घर के बच्चों का शमशान जाना तय .....
पंजाब राजस्थान और गुजरात के कई हजारों लोग ऐसे ही बदनसीब हैं.... हाँ इस सूची में कश्मीर के लोग नहीं हैं क्योंकि वहाँ लोग लापता नहीं होते.....बंदूक का निशाना बनते हैं.... कभी वोबंदूक चलाने वाले हाथ पाकिस्तानी फौज के होते हैं तो कभी आतंकवादियों के.....और कभी 'किसी और के'
सच है गरीब आदमी को जीने का कोई अधिकार नहीं है,,, खासकर सीमा के पास ..दोस्ती तो हम चाहतें है पाकिस्तान से लेकिन कम्ब्खत वोट मांगने वाले भिखारी कभी कारगिल करवाते हैं तो कभी कभी शानदार डीलक्स होटलों के बंद कमरों में कबाब और बोतलों के साथ तथाकथित शिखर वार्ता करते हैं......
इज्ज़त किसी भी नहीं है... न तो जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कहने वालों की न ही हिंदुस्तान के साथ १००० साल तक लड़ने की बात कहने वालों की....लेकिन पिसना जनता को है... मरना 'शहीदों' को है.... वो पिसते रहेंगे ..मरते रहेंगे....और वाघा बार्डर पर दो मुल्खों की दोस्ती के नारे लगते रहेंगे...

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