100 साल की उम्र में उठ गयी अर्थी....

>> Tuesday 11 March 2008

भारतीय हाकी
1928-2008
चक दे इंडिया का नारा जब लगा था तब हम बहुत खुश हुए थे...हों भी क्यों न आखिर तब हमने फुटबाल जीता, क्रिकेट जीता, और हाकी...... जिस खेल के लिए यह नारा लगा वो .. हाकी शायद हमारा राष्ट्रीय खेल भी है... शायद इसलिए क्योंकि हमने सिर्फ पढा हे या सुना है कि हाकी हमारा राष्ट्रीय खेल है। कभी भी आभास हीं हुआ. कि सचमुच हाकी हमारा राष्ट्रीय खेल है। हां सुना जरूर हे कि कभी ध्यानचन्द जैसे भी खिलाडी थे जो इतने खतरनाक थे की हिटलर जैसे तानाशाह ने उन्हें अपनी सेना में मार्शल बनने को कह दिया...इतना ही नहीं उनकी हाकी में ऐसी 'चुम्बक' थी की गेंद उसी से चिपकी रहती थी. लेकिन अब लगता है जैसे यह कहानिया झूठी हों..मुझे तो विश्वास ही नहीं होता की १९२८ से हम स्वर्ण पदक जीतते आ रहे हैं वो भी ओलम्पिक में.. लगता है की हाकी का नाम मिस-प्रिंट हो गया होगा इसी वजह से हम इसे राष्ट्रिय खेल कहते हैं...
हुआ यह की १०० साल पहले हाकी का जन्म हुआ था जब भारत ने स्वर्म पदक जीता था नीदरलैंड को हरा कर... लेकिन अब ब्रिटेन से ओलम्पिक क्वालिफायिंग मैच में ही हार कर हाकी ने प्राण त्याग दिए हैं..आखिर कब तक झेलती हाकी बेचारी बूदी तो सत्तर के दशक में ही हो चुकी थी ...लेकिन जान लगा कर १९८२ में फिर ओलम्पिक जीता...उसके बाद बीमार पड गयी...और आज मर गयी..
जो लोग कहते हैं क्रिकेट ने हाकी को मार डाला चिढ है मुझे ऐसे लोगों से...
जब हाकी में जित मिलती थी न तब हाकी लोगों की प्यारी थी..हर घर में रोटी बनाने के लिए आटा बाद में मिलता था हाकी पहले.. हाकी की खेती होती थी..जालंधर के पास एक गाँव से १२ खिलाडी निकले थे.. रही बात प्रायोजकों की तो वो भी बहुत थे उस समय के लिहाज़ से..हिटलर तक हमारे खिलाडियों को ललचाते थे..
पिछले कल जब यह खबर आई तो सारा रुख 'गिल' के इस्तीफे पर चला गया हाकी की दुर्दशा तो वहीं रह गयी..
समस्या एक ही है..राष्ट्रीय खेल.. छीन लो दर्जा..
शर्म आती है..

6 comments:

mahendra mishra 11 March 2008 at 9:14 AM  

apke vicharo se sahamat hun . haki sambandh me mera blaag dekhe
http://yamaraaj.blogspot.com

राज भाटिय़ा 11 March 2008 at 10:27 AM  

सुनील भाई अब कया करे,गलती किस की हे,खिलादियो की, बोर्ड की, नेताओ की यह सब भी विचार्निया हे,लेकिन अब पछताय होत कया जब चिडीया चुग गई खेत.

visfot 11 March 2008 at 11:57 AM  

जालिम क्या लिखा है आपने. खूब.

लोकेश 18 March 2008 at 9:11 AM  

नाम के ही नहीं, काम के भी जालिम हैं आप। इतना अच्छा लिखकर बखिया तो उधेड़ ही डालते हैं।
लगे रहिये।
शुभकामनायें।

दीपक भारतदीप 23 March 2008 at 1:11 AM  

बहुत बढिया आलेख.
दीपक भारतदीप

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