रोते तो अब भी हैं वे बदनसीब .....पर अब आखों से आसूं नहीं निकलते!

>> Tuesday 4 March 2008

सियासतदानों को सियासत से फुरसत नहीं,
उन कम्बख्तों को रोने से वक्त नहीं मिलता,
बात जब निकलती है तो दूर तलक जाती है. आप सब ने सुना है ही होगा की पाकिस्तान की जेल में ३५ बर्षों से बंद कश्मीर सिंह को रिहा कर दिया है. इससे पहले उन्हें मौत की सजा सुना दी गयी थी लेकिन किस्मत ने साथ दिया और रिहा हो गए. लेकिन जानते हैं ऐसे कितने ही लोग वहाँ बंद हैं. अनगिनत. १९९९ और १९७१ के युध्बंदियों को तो छोडो १९६५ के कई युध्बंदी सड़ कर मर भी गए पाकिस्तान की जेलों में....
सन् १९७१ के ५७ युध्बंदियों की बात तो कभी खुली ही नहीं जिन्हें पाकिस्तान की जेलों में बंद किया गया है... याद तो होगा ही आपको की कैसे दोमुंहे सांप की तरह पाकिस्तान ने युध्बंधियों के परिजनों को न्योता दिया की आकर चेक कर लें पाकिस्तान की जेलों में की हैं यहाँ उनके परिजन या नहीं,,,,, लेकिन उन्हें जेलों में जाने ही नहीं दिया गया बल्कि जेलों के रजिस्टर दिखा कर विदा कर दिया गया की यहाँ उनके रिश्तेदार नहीं हैं...
उन लोगों की तो छोडे जो ज्ञात कैदी हैं अरे भाई कई हजारों अज्ञात कैदी भी हैं वहाँ की जेलों में...जो बेचारे आम आदमी हैं भारत के... जिनका कोई नहीं है...और अगर कोई है भी तो वो इतना लाचार की अगर उन्हें छुड़ाने के लिए दिल्ली दरबार तक भी गुहार लगाने की सोचे तो भी नामुमकिन लगता है......उदहारण के लिए मान लीजिये की पठानकोट (गुरदासपुर, पंजाब) से गुम हुए किसी आदमी का परिजन कोई आदमी जो गरीब है अगर दिल्ली आना चाहे तो किराया लगता है २५० रूपए मतलब की एक सप्ताह की कमाई ....और सोचिये की दिल्ली आना मतलब एक सप्ताह भर तक मजदूरी न कर पाना....मतलब घर के बच्चों का शमशान जाना तय .....
पंजाब राजस्थान और गुजरात के कई हजारों लोग ऐसे ही बदनसीब हैं.... हाँ इस सूची में कश्मीर के लोग नहीं हैं क्योंकि वहाँ लोग लापता नहीं होते.....बंदूक का निशाना बनते हैं.... कभी वोबंदूक चलाने वाले हाथ पाकिस्तानी फौज के होते हैं तो कभी आतंकवादियों के.....और कभी 'किसी और के'
सच है गरीब आदमी को जीने का कोई अधिकार नहीं है,,, खासकर सीमा के पास ..दोस्ती तो हम चाहतें है पाकिस्तान से लेकिन कम्ब्खत वोट मांगने वाले भिखारी कभी कारगिल करवाते हैं तो कभी कभी शानदार डीलक्स होटलों के बंद कमरों में कबाब और बोतलों के साथ तथाकथित शिखर वार्ता करते हैं......
इज्ज़त किसी भी नहीं है... न तो जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कहने वालों की न ही हिंदुस्तान के साथ १००० साल तक लड़ने की बात कहने वालों की....लेकिन पिसना जनता को है... मरना 'शहीदों' को है.... वो पिसते रहेंगे ..मरते रहेंगे....और वाघा बार्डर पर दो मुल्खों की दोस्ती के नारे लगते रहेंगे...

5 comments:

कमलेश मदान 4 March 2008 at 11:23 AM  

अब आप सही लेखन की ओर बढ रहे हैं भले ही यह राजनीति से परे एक विचाराधीन समस्या है लेकिन इसमें जो दर्द छिपा है वो किसी भी मुल्क की सरकारों को नजर नहीं आता.

अपनी कलम को और पैना (तलवार की तरह ) करिये और चुभो दीजिये इस संदे समाज और इस देश की गंदी राजनीति में ! लगे रहिये आप जल्दी आगे बढेंगें

आपका
कमलेश मदान

राज भाटिय़ा 4 March 2008 at 1:07 PM  

अरे वाह सुनिल बहुत अच्छा लेख लिखा हे,एक जिन्दा सचाई हे जिसे नजर अन्दाज किय जाता हे, बहुत बहुत धन्यवाद

notepad 4 March 2008 at 6:37 PM  

ह्म्म !
गम्भीर विमर्श जारी रखें ।

Udan Tashtari 4 March 2008 at 8:19 PM  

अच्छा लगा आपके संजीदा विचार पढ़ना. लिखते रहें.

mamta 4 March 2008 at 10:20 PM  

सच्चाई को बताता लेख।

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