सर्वजीत से अफ़ज़ल का वास्ता!

>> Sunday 16 March 2008

खबर है कि पाकिस्तान कि जेल में बंद सर्वजीत को काल कोठरी में डाल दिया गया है.. मतलब उसकी फंसी कि सजा तय है..वैसे 'डेथ वारंट' भी जारी कर दिया गया है....
अब जरा खबर के पह्लुयों पर नज़र डाली जाए. सर्वजीत वहाँ बम धमाके के आरोप में बंद है..आरोप साबित हो चूका है..माफीनामा नामंजूर कर दिया गया है..अभियुक्त को काल कोठरी मैं डाल दिया गया और भारत में सियासत तेज हो चुकी है..मन जाता है कि सर्वजीत बेकसूर है और उसकी बहने और परिवार वाले लगातार प्रयत्न कर रहे है कि वह छूट जाए लेकिन बड़ते वक्त के साथ हालत मुश्किल भी नज़र आ रहे हैं..इतिहास गवाह है कि जब बात पाकिस्तान कि होती है तो सबका खून खौला जाता है.. इस बार भी ऐसा ही हो ढ़ग है..बचाव पक्ष वालों का कहना है कि सर्वजीत तो रास्ता भूल कर बोर्डर पार कर गया और नामुरादों के हाथ चढ़ गया.. साथ ही उसकी बहन कि 'युवराज' राहुल गाँधी से मुलाकात भी इस बात को ज़ाहिर करती है कि कुछ तो हो सकता है...

लेकिन जिंदगी इतनी आसान भी नहीं है...एक पल के लिए सर्वजीत को भूल कर जरा सोचिये कि क्या हम किसी बम बिस्फोट के अपराधी को छोड़ सकते हैं..नहीं ना....सुनने में कड़वा लगता है लेकिन अफ़ज़ल का मुद्दा भी ऐसा ही तो है...फर्क बस इतना है कि वह गद्दार हिन्दुस्तानी है जबकि सर्वजीत पाकिस्तान के लिए गैर मुल्खी है..

मामला सीधा सा है पाकिस्तानी इतने नरमदिल नहीं कि उसे छोड़ दें हाँ भारतीयों से जरूर उम्मीद कि जा सकती है क्योंकि इससे पहले भी तो हमारे एक विदेश मंत्री कुछ 'लोगों' को कंधार छोड़ कर आये थे.. होता रहता है...आखिर उन 'बेचारों' ने भारत की बढती हुई आबादी पर लगाम लगाने कि ही तो कोशिस कि थी.
खैर, वैसे बडे लोगों की छोटी दुनिया में तो चर्चा है की सोदेबजी हो सकती है अफ़ज़ल और सर्वजीत के लिए..
उनका खुदा और हमारा खुदा 'रहम' करे...

6 comments:

हिन्दु चेतना 16 March 2008 at 11:59 PM  

आतंक का सामना करने की बात जब आती है तो भारत की तस्वीर एक नपुंसक राष्ट्र के रूप में उभरती है।
पोटा को निरस्त कर मेरी समझ से अच्छा नहीं किया गया। आज जिस जैश के आतंकवादी यहां इतने सक्रिय हैं अगर उसके सर्वेसर्वा मसूद अजहर को फांसी दे दी गई होती तो यकीनन संगठन कमजोर होता। अभी अफजल को फांसी दिये जाने में देरी हो रही है इसका भी फायदा आतंकवादी संगठन उठा लें तो कोई आश्चर्य नहीं।
आतंकवादियों के विरूद्ध अभियान चलाने में मुझे मानवाधिकारवादियों की फिजूल रूकावटों का भी सामना करना पड़ा। वहां हर कार्रवाई पर उनका विरोध करना एक सामान्य बात हो गई थी, लेकिन किसी ने यह ध्यान नहीं दिया कि मानवाधिकार हनन की घटनायें कितनी सही थी।
एक सरकार जो कानून बनाती है दूसरी आते ही उसे निरस्त कर देती है। फिर केंद्र सिमी को आतंकी संगठन घोषित करता है तो कुछ राज्य नहीं। ऐसे मामले सुरक्षा बलों को न सिर्फ कनफ्यूज करते हैं बल्कि आतंकवादियों से निपटने में आप कितने ढीले हैं यह भी दर्शाते हैं। जैसे-जैसे आतंकवादियों का नेटवर्क भारत के भीतरी भागों में फैल रहा है इसके खिलाफ ठोस, कारगर व पारदर्शी नीति अपनानी होगी। आईबी और रॉ को मजबूती देनी होगी। अब खुफिया तंत्र को जिला स्तर पर फैलना होगा।

राज भाटिय़ा 17 March 2008 at 9:24 AM  

सुनील बहुत ही उचित लिखते हॊ, ओर बात को ज्यादा लम्बा ना करके सीधे काम की बात पर आते हॊ,यानि की सीधी जड पकडते हॊ, बहुत खुब, भगवान तुम्हारी कलम कॊ ओर भी जालिम बानये ( एक पत्रकार की तलबार उस की कलम होती हे )ओर फ़िर वो तलबार एक डोगरा के हाथ मे हो तो कहना ही कया.

लोकेश 18 March 2008 at 9:20 AM  

जरा ध्यान दीजियेगा।
आपकी कुछ पोस्ट के text, justify mode में हैं, कुछ left align में।
इटरनेट एक्सप्लोरर में तो चल जाता है, लेकिन मुझ जैसे Mozilla, Netscape आदि के उपयोगकर्ता justify वाले टेक्स्ट नहीं पढ़ पाते।
ध्यान दीजियेगा।

व्याकुल ... 17 April 2008 at 10:56 AM  

डोगरा जी ,
इस बात में कोई दो राय नहीं की आप की लेखनी जब चलती है तो फिर सच्चाई को उधेर कर रख देती है...मैं आपकी लेखनी को सलाम करता हूँ...आप का यह आर्टिकल भी उतना ही प्रभावशाली है जितना की पिछले..मगर हाँ आज मैं आपका धयान आपकी कुछ खामियों की तरफ दिलाना चाहता हूँ...पहली खामी तो यह की आप आर्टिकल प्रकाशित करते वक़्त कृपया शब्दों पर ध्यान दें..आपके लिखे कई शब्दों अपना अर्थ नहीं खोज पाते...जैसे फांसी की जगह फंसी ....माना की जगह मन आदि शब्द...हालांकि आज अफजल का माफिनमा मंजूर कर उसे वीसा दे दिया गया है..मगर आपकी रचना उस वक़्त के हिसाब से सटीक बेठी है जब आपने इसे प्रकाशित किया होगा....

आपका रविंदर टमकोरिया 'व्याकुल'

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