साथी हाथ बढाना- मिल के 'कूड़ा' उठाना

>> Thursday 27 March 2008

एक अकेला थक जायेगा
मिल कर 'कूड़ा' हटाना
हमारे यहाँ गंदगी बहुत होती है.. 'हमारे यहाँ' से मतलब है की हर जगह..हिंदुस्तान में.. कुछ माह पहले मुझे सुबह उठ कर पार्क में जाकर टहलने की आदत हुई. वैसे में हिमाचल का रहने वाला हूँ अब दिल्ली में रहता हूँ.. लेकिन हिमाचल में पार्क नहीं होते.. होते हैं तो शहरों में मैं तो गाँव में रहता तय लेकिन हमारा गाँव दिल्ली के पार्क से कहीं बेहतर था.. चारों तरफ बर्फ से ढके पहाड़, साफ सुथरी सड़क, लहलहाते फूल, मदमस्त फसल और कुछ दूर जाकर चाय के शानदार बगीचे भी..खैर, दिल्ली में आकर सुबह उठ कर टहलना शुरू किया जब पहले दिन में गया तो सुबह सुबह सड़क पर घूमने लगा लेकिन यहाँ तो सुबह भी प्रदुषण था...बदबू थी..हमने पडा था की गाँधी जी कहा करते थे की सुबह सुबह हम प्रकृति की ताजी हवा का आनंद ले सकते हैं.. लेकिन मुझे तो वैसी हवा भी नसीब नहीं हुई जैसी मेरे गाँव में दोपहर को चलती थी.. फिर में पार्क में गया.. बहुत से लोग वहाँ व्यायाम, योग आदि कर रहे थे.. लेकिन वहाँ भी गंदगी थी.. मैं वापस आ गया...
अब यही चारा था कि में सुबह न जाऊँ या फिर......
और मैंने दूसरा विकल्प चुना.. मैं अगले दिन एक लिफाफा लेकर गया और पार्क में जाकर कूडा बीनने लगा.. फिर मैं रोज वहाँ जाता.. वहाँ आने वाले लोग मुझे टुकर-टुकर देखते.. कुछ लोगों ने मुझसे पुछा भी..कई ने बेबकूफी कहा, कुछ ने सराहा लेकिन मेरे साथ कूडा किसी ने नहीं उठाया..
मैंने अपनी बात को कुछ मित्रों के आगे रखा.. कुछ ने मेरा साथ भी दिया लेकिन कुछ ही दिन..फिर धीरे धीरे प्रशासन दुरुस्त हुआ और पार्क साफ.. हाँ गंदगी अब भी होती है लेकिन अब अपनी व्यस्तताओं के कारण मैं नहीं जा पता लेकिन फिर भी हालात बेहतर हैं...
हमारी परेशानी यह है कि हम हर चीज़ का दोष सरकार पर डाल देते हैं...क्यों न हम भी कूडा उठाएं ..रोज नहीं तो कम कम से सप्ताह में एक दिन.. और कूडा नहीं उठा सकते तो कम से कम कूडा न फैलायें... तभी तो भारत 'भारत' बन पाएगा...

4 comments:

राज भाटिय़ा 27 March 2008 at 12:25 PM  

सुनील बहुत खुब,आप ने बहुत अच्छा काम किया,अगर आप को देख कर एक आदमी भी ऎसे करने लगे तो उसे देख कर दो ऊठे गे फ़िर चार एक दिन हमारा भारत साफ़ सुधारा होगा,बेबकुफ़ी बही कहते हे जो सबसे ज्यादा गन्द मे रहना पसन्द करते हे,

Neeraj Rohilla 27 March 2008 at 2:08 PM  

सुनीलजी,
आपकी सोच और आपके विचार बडे कातिल हैं । आज से हम भी दरबार-ए-जालिम के मुरीद हो गये हैं ।

Udan Tashtari 27 March 2008 at 8:48 PM  

आपको साधुवाद.

आपका कदम सराहनीय है, अनुकरणीय है.

काश, यह जज्बा कुछ और लोगों में जागे तो हिन्दुस्तान की तस्वीर ही बदल जाये.

नमन करता हूँ आपको.

शोभा 28 March 2008 at 3:24 AM  

सही बात है सुनील जी
बढ़िया लिखा है।

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