बडे बेआबरू हो कर 'उस' कूचे से हम निकले...

>> Saturday 29 March 2008

इंसान एक जगह टिक कर नहीं बैठ सकता. और फिर अगर आप मीडिया में हों तब तो कभी एक जगह टिक ही नहीं सकते. और सही भी है आगे बढने का हक तो सभी को है.. में तो अक्सर अपने दोस्तों से कहता हूं की 'छोटे सपने देखना पाप है'...

हुआ यूँ की कुछ दिन पहले मैं एक नई मासिक पत्रिका में इंटरव्यू देने के लिए गया...नाम लेना ठीक नहीं रहेगा लेकिन यह पत्रिका अभी अभी निकल रही है और इसके २ ही अंक निकल पाएं हैं अब तक... खैर, मैं वहाँ इंटरव्यू के लिए पहुंचा.. कुछ देर बाद मेरा इंटरव्यू शुरू हो गया..मैंने उन्हें अपना रिज्युमे दिया.. विभिन पत्र-पत्रिकाओं मैं छपे अपने लेख दिखाए..

फिर उन्होने मेरा रिज्युमे देख कर कहा तो आप इस समाचार पत्र में डेस्क पर काम करते हैं, मैंने जवाब दिया जी हाँ... उन्होने कहा..मतलब आप सब-एडिटर हैं..मैंने कहा, हाँ...उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ... उन्होने हमारे समाचार पत्र के एक वरिष्ठ व्यक्ति का नाम लिया जो डेस्क पर ही हैं.. और पूछा तब तो आप उन्हें जानते होंगे..मैंने कहा हाँ बिलकुल जानता हूँ. फिर उन्होने मुझे कहा की आप उनसे लिखवा कर लाएं तब 'जैसा आप कहेंगे वैसा होगा'......

और फिर ठीक उनके कहे अनुसार लिखित प्रमाण भी मैंने प्रस्तुत करदिया...२ दिन बाद मैं कार्यालय से 'येन केन प्रकारेण' लिखवा कर लाया और पत्रिका को सौंप दिया..लेकिन उन पर कोई असर नहीं.. वे यह मानने को तैयार ही नहीं थे की किसी राष्ट्रिये अख़बार मैं मात्र १९ साल का लड़का उप संपादक बन सकता है..
उनका व्यव्हार मेरा अपमान था.. उनकी गोल मोल बातें मेरी सच्चाई पर चोट थी..

मैं किसी तरह वहाँ से उठ कर आया... लेकिन मेरी भड़ास वहाँ नहीं निकली...यहाँ निकल रही है...
लोग समझते है की वो तरक्की नहीं कर पाए तो कोई भी नहीं कर पायेगा...

3 comments:

राज भाटिय़ा 29 March 2008 at 12:53 PM  

सुनील भाई जिन्दगी एक लडाई हे, ऎसे मुकाम बहुत आये गे,लेकिन हिम्मत मत हारो, ओर भाई ऎसे सबुत भी मत दो आप ओर आप की कब्लियत ही आप का सबूत हे,उस की एक पत्रिका हे आप के पास तो पुरे भारत की पत्रिका हे यह नही तो दुसरी सही,दुसरी नही तो तीसरी सही बाद मे यही गधे आप के पीछे भागेगे, सो कल आप का हे यह पक्की बात हे.

neeshoo 29 March 2008 at 1:59 PM  

sunil tumhari baat se mai sahmat hun .aaj toh yahi hai khas kar journalism me ....

PD 29 March 2008 at 9:17 PM  

सब अपने अपने क्षेत्र की बात है.. पत्रकारिता में पके बाल और मोटा सा चस्मा ही अनुभव की पहचान है.. हमारे आई.टी. में जो जितना युवा है उससे उतनी ज्यादा उम्मीद लगाई जाती है.. वैसे संघर्ष ही जीवन का दूसरा नाम है मैंने तो अब तक के छोटे से जीवन में यही सीखा है..

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