ओलम्पिक मशाल चली गयी और घाव दे गयी

>> Saturday 19 April 2008

ओलम्पिक मशाल चली गयी और घाव दे गयी...............एक घटना याद आती है
उस समय राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे. और माननीय प्रधानमंत्री जी ओमान के दौरे पर थे. हमेशा की तरह मीडिया के कुछ पत्रकार भी प्रतिनिमंडल में थे और यात्रा के दौरान एअरपोर्ट पर भारतीय एसपीजी तथा वहन की स्थानीय पोलिश में ठन गयी. बात यूँ हुई की भारतीय मीडिया के समान की निगरानी एसपीजी कर रही थी और वहाँ की पुलिस का यह अधिकार था. वहाँ के एक पुलिस अधिकारी ने एसपीजी से बड़ी नम्रता से कहा कि आप निगरानी छोड़ दें, यह हमारा काम है.. लेकिन जब एसपीजी नहीं मणि तो वो गुस्से में आ गए और कहा कि आपको आपका समान नई दिल्ली में मिल जायेगा और इस तरह उन्होने सुरक्षा अपने हाथ में ले ली.

इस घटना कि याद एक दम ताज़ा हो गयी जब हम मशाल दौड़ देख रहे थे. भारत में पूरी मशाल दौड़ कि निगरानी का काम चीनी कमांडो ने किया.. यहाँ तक कि योजना तक उन्होने बनाई और यह भी उन्होने ही तय किया कि किस व्यक्ति के पास कितनी देर तक मशाल रहेगी.. आज भारतीय एसपीजी उस घटना को भूल गयी और यह कहने का सहस नहीं जुटा पाई कि मशाल जब तक भारत में रहेगी भारत ही सुरक्षा व्यवस्था देखेगा. मतलब भारत के पास मशाल को सुरक्षित रखने कि काबलियत नहीं है शर्मसार हुआ है देश..

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प्रियंका का मतलब राजनीति ही नहीं कुछ और भी है!

>> Tuesday 15 April 2008

हर चीज़ के पीछे राजनीति है नहीं होती. लेकिन हमारा मीडिया इतना प्रदूषित हो चुका है कि हर चीज़ पर शक करता है. जब स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी कि हत्या की गयी थी उस समय मैं तो बहुत छोटा था लेकिन हमारे बॉस बताते हैं की वे बहुत ही अच्छे इंसान थे. हमारे संपादक श्री अश्विनी कुमार जी तो राजीव जी के अच्छे मित्र थे. वैसे भी राजीव जी मृत्यु बहुत बड़ी त्रासदी थी.



अब जब इसके कई सालों बाद जब प्रियंका गाँधी ने नलिनी से मुलाकात की है

जो की राजीव गाँधी की हत्या में अआरोपी है तो कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं लेकिन मामले को बड़ी नज़र से देखने की जरूरत है. आम तौर पर पिता से बेटियों से ज्यादा लगाव होता है प्रियंका का भी होगा. और अगर वह अपने पिता के कातिल से मिलती है तो यह उसका निजी मामला है.. राजनीती बिलकुल नहीं होनी चाहिए.
वैसे प्राप्त ख़बरों के अनुसार उनकी मुलाकात बड़ी भावुक मुलाकात थी. पहले दोनों रोई. फिर संवेदनशील बाते हुई. जो बातें वकीलों के सामने हुई वो बेशक सामने आ गयी हों. लेकिन कई बातें उनकी अंतरंग भी थी. और हो सकता है की राजीव जी की हत्या के पीछे मुख्य कारण प्रचलित कारण से अलग हो...
मामले को व्यापक दृष्टि से देखने की जरूरत है.. राजनीती की नहीं . प्रियंका संवेदनशील हैं.. बेटियाँ सम्बेद्नशील होती हैं.. इंसानियत के नाते, लड़का - लाक्द्की की तथाकथित समानता के नाते बस करो..


हम प्रियंका की पहल का स्वागत करते हैं.

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लोकतंत्र की कसौटी पर खरा नहीं उतरता डा.कलाम का प्रस्ताव

>> Tuesday 1 April 2008

जनता के राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने कुछ दिन पूर्व एक प्रस्ताव रखा. चूँकि कलाम साहब की सबकी नज़रों में बहुत इज्ज़त है इसलिए सब ने उस प्रस्ताव पर बड़ी गौर से विचार किया. चर्चा पर आगे बढने से पहले जरा एक नज़र प्रस्ताव पर मार लें...

सांसदों का कार्यकाल एक बर्ष बडा दिया जाये तथा बडे हुए बर्ष में उन्हें व्हार्टन या हार्वर्ड में मनैज्मेंट का प्रशिक्षण लेने के लिए भेजा जाये.. ताकि संसद पार्टी के प्रति मोह छोड़ सकें

पहली बात एक कम्पनी को मनेज्मेंट से चाल्या जा सकता है..किसी राष्ट्र को नहीं.. और फिर हमारे देश में तो कामराज और बसंत साठे जैसे नेता हुए है जो अनपढ़ थे परन्तु विश्व के महान प्रशासक साबित हुए हैं.. अकबर और अशोक जैसे सम्राट कभी हारवर्ड नहीं गए..
इतना ही नहीं हमारे देश के नेता हार्वर्ड में जरूर पडा चुके हैं जिनमे लालू यादव भी शामिल हैं..लेकिन तर्क यह नहीं हैं..
तर्क लोकतंत्र से जुडे हैं. भराटी उन चुनदा देशों से है जहाँ समाज के हर तबके को एक साथ वोट देने का अधिकार मिला..जबकि अधिकतर पश्चमी देशों में वोट का अधिकार पाने के लिए क्रांतियाँ हुई..ताकि सीमित लोकतंत्र को ख़त्म किया जा सके.. वैसे भी लोकतंत्र का मतलब होता की लोगों का तंत्र.. संसद अमीन समाज का आइना होना चाहिए ना की चटर-पटर अंग्रेजी बोलने वाले विदेशी दिमाग.. हमे ऐसे लोग चाहिए जो समाज को समझ सकें क्योंकी भारत में ७० प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो दिन में यह समझ पाने में असमर्थ होते हैं की रात को रोटी नसीब होगी की नहीं..

सलाह देना और उसका पालन करना अलग अलग चीजे हैं.. वैसे भी संसद बदलते रहते हैं कितने लोगों को हार्वर्ड भेज कर पैसे फूंकेंगे.. वह लोग वहाँ से भोले-भले लोगों को मूर्ख बनाने के नये गुर ही सीख के आयेंगे... जहाँ तक पार्टी के मोह की बात है तो पार्टी को विचारधारा का प्रतीक माना जाता है

सबसे अच्छा उपाए है की भारत की शिक्षा प्रणाली को दुरुस्त बनया जाये और सबको शिक्षा मिले..

इस प्रस्ताव का कई बुद्धिजीवी लोगों ने विरोध किया है जिन में पत्रकार नीरजा चौधरी भी शामिल हैं..

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