प्रियंका का मतलब राजनीति ही नहीं कुछ और भी है!

>> Tuesday 15 April 2008

हर चीज़ के पीछे राजनीति है नहीं होती. लेकिन हमारा मीडिया इतना प्रदूषित हो चुका है कि हर चीज़ पर शक करता है. जब स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी कि हत्या की गयी थी उस समय मैं तो बहुत छोटा था लेकिन हमारे बॉस बताते हैं की वे बहुत ही अच्छे इंसान थे. हमारे संपादक श्री अश्विनी कुमार जी तो राजीव जी के अच्छे मित्र थे. वैसे भी राजीव जी मृत्यु बहुत बड़ी त्रासदी थी.



अब जब इसके कई सालों बाद जब प्रियंका गाँधी ने नलिनी से मुलाकात की है

जो की राजीव गाँधी की हत्या में अआरोपी है तो कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं लेकिन मामले को बड़ी नज़र से देखने की जरूरत है. आम तौर पर पिता से बेटियों से ज्यादा लगाव होता है प्रियंका का भी होगा. और अगर वह अपने पिता के कातिल से मिलती है तो यह उसका निजी मामला है.. राजनीती बिलकुल नहीं होनी चाहिए.
वैसे प्राप्त ख़बरों के अनुसार उनकी मुलाकात बड़ी भावुक मुलाकात थी. पहले दोनों रोई. फिर संवेदनशील बाते हुई. जो बातें वकीलों के सामने हुई वो बेशक सामने आ गयी हों. लेकिन कई बातें उनकी अंतरंग भी थी. और हो सकता है की राजीव जी की हत्या के पीछे मुख्य कारण प्रचलित कारण से अलग हो...
मामले को व्यापक दृष्टि से देखने की जरूरत है.. राजनीती की नहीं . प्रियंका संवेदनशील हैं.. बेटियाँ सम्बेद्नशील होती हैं.. इंसानियत के नाते, लड़का - लाक्द्की की तथाकथित समानता के नाते बस करो..


हम प्रियंका की पहल का स्वागत करते हैं.

7 comments:

Dr.Parveen Chopra 15 April 2008 at 8:54 AM  

डोगरा जी, मैं भी आप से 200प्रतिशत सहमत हूं...वैसे इस पोस्ट से आप की संवेदनशीलता की भी झलक मिलती है।

Neeraj Rohilla 15 April 2008 at 9:05 AM  

डोगराजी,
शायद इसी को क्लोजर की तलाश कहते हैं । उदाहरण के लिये सभी मनोवैज्ञानी मानते हैं कि किस प्रकार वर्षों बाद किसी गुमनाम व्यक्ति की मृत्यु का प्रमाण मिलने पर पहले परिवार शोक में डूबता है लेकिन यही प्रमाण क्लोजर (पता नहीं इसकी हिन्दी क्या होगी) प्रदान करता है ।

अगर कोई अभिन्न मित्र बिना किसी कारण अचानक बात करना बन्द कर दे, और कारण पता न हो तो ज्याद तकलीफ़ होती है । कारण पता चलने के बाद गलती किसी की भी हो, मन को थोडा सन्तोष मिलता है ।

अब इस मीडिया का क्या कहें, इसे तो पूरी दाल ही काली दिखती है ।

अतुल 15 April 2008 at 9:28 AM  

इसमें राजनीति नहीं देखनी चाहिए किसी को.

Udan Tashtari 15 April 2008 at 6:16 PM  

सही कह रहे हैं आप-इसे राजनीति से दूर रखना चाहिये पर ऐसा हो कहाँ पायेगा.

व्याकुल ... 17 April 2008 at 11:10 AM  

भइया डोगरा जी..
आप का कहना सच है...सबसे पहले हम इंसान है ...बाद में हमारी अलग पहचान है...फिर चाहे वो जो भी हो..चाहे आप..मैं या फिर प्रियंका जी...मगर मीडिया को इन बताओं से क्या फर्क पड़ता है..उनका भी तो कहना सही है की...पहले उनका काम हो..फिर चाहे सब बदनाम हो ...सब चलता है यार...

राज भाटिय़ा 19 April 2008 at 9:42 AM  

मुझे इस बारे कुछ नही पता, तो कया बोलु, बस हाजरी देने आया हू.

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