हाँ, फैशन पवित्र होता है...

>> Friday 16 May 2008

एक और बलात्कार! जम के फैशन करो.. पोस्ट पर चर्चा करते हुए एक महोदय ने प्रश्न उठाया कि फैशन पवित्र या पतित कैसे हो सकता है.. इसी विषय पर चर्चा को आगे बदने के लिए यह लेख लिख रहा हूँ...

पहले फैशन का व्यापक अर्थ समझने का प्रयास करते हैं.. फैशन सीधे तौर पर सोन्दर्य से जुडा है.. और भारतीय संस्कृति के अनुसार तो सौन्दर्य का बहुत महत्व है. जब भी किसी पुराण में देवी- देवताओं कि स्तुति होती है तो उनके सौन्दर्य का व्यापक रूप देखने को मिलता है. कल्पना के सागर में डूब कर उनके रूप साज-सज्जा (फैशन) का वर्णन किया जाता है.. भगवन कृष्ण की सुन्दर सज-सज्जा, मां दुर्गा का भव्य स्वरूप, मां लक्ष्मी के सुंदर आभूषण.. सब फैशन का ही तो रूप हैं.. और ईश्वर से जुडी हर चीज़ पवित्र होती है.. उसी पवित्रता को मनुष्यों द्वारा अपनाया गया है...

वैसे भी देवताओं और दानवों में मुख्य भौतिक अंतर क्या है.. स्पष्ट रूप से साज-सजा अर्थात फैशन ..देवताओं का स्वरूप सुन्दर है, उनकी साज-सज्जा आकर्षक है.. इसलिए वो पवित्र हैं लेकिन इसके विपरीत दानव कुरूप हैं, उनकी साज-सज्जा भयानक है, अतः वे अपवित्र हैं.. यह बात हिन्दू पुराणों में ही नहीं बल्कि हर धर्म के स्वरूप के अनुसार है.
प्रकृति भी सुन्दर है, क्योंकि इसकी साज-सज्जा उपयुक्त है, फिर फैशन कैसे पवित्रता की सीमा के बाहर रखा जा सकता है.यह संभव ही नहीं है. . भाषा के चक्कर में पड़ कर हम कैसे एक ही शब्द के अलग अलग अर्थ ले सकते हैं. हाँ फैशन की भी उसी तरह सीमायें हैं जैसे की हर चीज़ की होती हैं
बिना किसी शंका के फैशन पवित्र है..

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कान पकाऊ महिला सशक्तिकरण..

>> Saturday 10 May 2008

जेपी आन्दोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण एक नारा लगते थे. 'इनसे नहीं लड़ाई है पुलिस हमारा भाई है' कितना सुखद नारा था.. आजकल कोई भी अगर आगे बदने की, मज़बूत होने की कोशिस करता है तो न जाने क्यों किसी की छाती पर पांव रखकर ही रास्ता बनाता है..

नारी शक्ति मजबूत हो, हम भी यही चाहते हैं लेकिन महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली फौज अनावश्यक रूप से मर्दों को अपना शत्रु मान लेती है. न जाने उन्हें क्यों लगता है की हर समस्या का हल पुरुषों को कोस कर ही निकल सकता है. मुझे इस विचार से चिड होती है.. दुश्मनी बांधकर रास्ता मुश्किल होता है... फिर यहाँ फिर यहाँ घोडा और घास जैसी तो बात है नहीं को दोस्ती नहीं हो सकती.. दरअसल आगे बदने की होड़ मैं उचित रह न मिलने पर लोग गुमराह हो जाते हैं.. यही बात हर जगह लागु है.. महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले लोग आज पुरुषों को गाली निकलते हैं...



ऐसी ही हालत रही तो वो दिन दूर नहीं जब पुरुष सशक्तिकरण की बात करनी पड़ेगी
और ऐसा हो भी रहा है.. कल तक दलितों को आरक्षण की बात होती थी, लेकिन दलितों को आगे लेन के चक्कर मैं अगडों को पीछे धकेल दिया गया और आज गरीब अगडों के लिए भी आरक्षण की बात होती है...



जरा सभंल कर...

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अम्बुमणि रामदौस सही कहते हैं क्या? ...लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी तो ईमानदार आदमी हैं.

>> Sunday 4 May 2008

सबसे पहले यह बता दूं कि माना जाता है प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं. अब बात आगे बढाते हैं. आजकल, आजकल ही क्या हमेशा से ही हमारे देश के स्वास्थ्य मंत्री अम्बुमणि रामदौस कि निंदा होती रही है.. खासकर मीडिया में, और आधे से ज्यादा भारत वही सोचता है जो मीडिया कहता है..बाकी भारत सोचता ही नहीं है..और इसके बाद भी अगर कोई बच जाता है तो माना जाता है उसे सोचना ही नहीं आता....

रामदौस सबसे पहले तब चर्चा में आये थे जब उन्होने फिल्मों में धूम्रपान न दिखाने कि बात कही थी... सिफारिश लगभग कबूल भी हो गयी थी, लेकिन केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल हो गया और जैपाल रेड्डी के स्थान पर प्रियरंजन दा को सूचना प्रसारण मंत्री बनाया गया.. और उन्होने सिफारिश मानने से इंकार कर दिया... माना जाता है कि फिल्म जगत में फैसले का विरोध हो रहा था, वैसे भी इस मंत्रालय को कमाई बाला समझा जाता है.. लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...

...अब कुछ दिन पहले भी रामदौस जी ने सुझाव दिया कि फिल्मों में 'जाम' न दिखाएँ जाएं क्योंकि इनका बुरा प्रभाव पड़ता है नई पीड़ी पर... मिडिया ने भी रामदौस का खूब मज़ाक उडाया.. एक बडे पत्रकार ने तो यहाँ तक लिख दिया कि मंत्री जी मुनि हो गए हैं...सूचना प्रसारण मंत्रालय ने भी साफ मना कर दिया लेकिन उस पर तो सवाल उठ ही नहीं सकता क्योंकि प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...

लेकिन मुझे लगता है कि रामदौस जी सही कह रहे हैं... आखिर फिल्मों का बहुत प्रभाव पड़ता है समाज पर.. हर रोज न जाने कितने ही अपराध फिल्मी तरीकों से होते हैं.. हम कैसे भूल सकते हैं कि फिल्मों से ही 'गांधीगिरी' पैदा हुई थी और अभी कुछ दिन पहले 'चक दे इंडिया' भी तो फिल्म का ही प्रभाव था.. गिनाने कि जरूरत नहीं है.... लेकिन प्रिय दा ने सोच समझ कर फैसला किया होगा... क्योंकि प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...

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