अम्बुमणि रामदौस सही कहते हैं क्या? ...लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी तो ईमानदार आदमी हैं.

>> Sunday 4 May 2008

सबसे पहले यह बता दूं कि माना जाता है प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं. अब बात आगे बढाते हैं. आजकल, आजकल ही क्या हमेशा से ही हमारे देश के स्वास्थ्य मंत्री अम्बुमणि रामदौस कि निंदा होती रही है.. खासकर मीडिया में, और आधे से ज्यादा भारत वही सोचता है जो मीडिया कहता है..बाकी भारत सोचता ही नहीं है..और इसके बाद भी अगर कोई बच जाता है तो माना जाता है उसे सोचना ही नहीं आता....

रामदौस सबसे पहले तब चर्चा में आये थे जब उन्होने फिल्मों में धूम्रपान न दिखाने कि बात कही थी... सिफारिश लगभग कबूल भी हो गयी थी, लेकिन केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल हो गया और जैपाल रेड्डी के स्थान पर प्रियरंजन दा को सूचना प्रसारण मंत्री बनाया गया.. और उन्होने सिफारिश मानने से इंकार कर दिया... माना जाता है कि फिल्म जगत में फैसले का विरोध हो रहा था, वैसे भी इस मंत्रालय को कमाई बाला समझा जाता है.. लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...

...अब कुछ दिन पहले भी रामदौस जी ने सुझाव दिया कि फिल्मों में 'जाम' न दिखाएँ जाएं क्योंकि इनका बुरा प्रभाव पड़ता है नई पीड़ी पर... मिडिया ने भी रामदौस का खूब मज़ाक उडाया.. एक बडे पत्रकार ने तो यहाँ तक लिख दिया कि मंत्री जी मुनि हो गए हैं...सूचना प्रसारण मंत्रालय ने भी साफ मना कर दिया लेकिन उस पर तो सवाल उठ ही नहीं सकता क्योंकि प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...

लेकिन मुझे लगता है कि रामदौस जी सही कह रहे हैं... आखिर फिल्मों का बहुत प्रभाव पड़ता है समाज पर.. हर रोज न जाने कितने ही अपराध फिल्मी तरीकों से होते हैं.. हम कैसे भूल सकते हैं कि फिल्मों से ही 'गांधीगिरी' पैदा हुई थी और अभी कुछ दिन पहले 'चक दे इंडिया' भी तो फिल्म का ही प्रभाव था.. गिनाने कि जरूरत नहीं है.... लेकिन प्रिय दा ने सोच समझ कर फैसला किया होगा... क्योंकि प्रियरंजन दासमुंशी ईमानदार आदमी हैं...

7 comments:

Anonymous 4 May 2008 at 12:10 PM  

लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी तो ईमानदार आदमी हैं...

अमित सिंह 4 May 2008 at 12:12 PM  

लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी तो ईमानदार आदमी हैं...


वाह क्या तीर मारा है... सचमुच रामदौस कि बात मानी जानी चाहिए

सागर 4 May 2008 at 12:14 PM  

कल तक मैं भी सोचता था कि रामदौस पागल हैं.. लेकिन आपने मेरी सोच ही बदल दी..

Udan Tashtari 4 May 2008 at 1:35 PM  

रामदौस के बारे में राय बदलनी होगी.

Dr.Parveen Chopra 4 May 2008 at 6:30 PM  

डोगरा जी, आप ने बिल्कुल सही कहा है कि फिल्में हमारी सोच तो बदलती ही हैं। और आपने जो उदाहरणें चुनी हैं बि्लकुल उपर्युक्त थीं....चक दे इंडिया और गांधीगिरी वाले लगे रहो मुन्नाभाई।

संजय बेंगाणी 5 May 2008 at 10:30 PM  

अब महेश भट्ट साब गौर फरमायें, उनके फिल्मी डॉन किसी साधू से कम नहीं होते.

राज भाटिय़ा 7 May 2008 at 1:09 PM  

मुझे तो कुछ नही पता कोन क्या हे ,

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