आओ नफरत उगायें...

>> Wednesday 7 May 2008

सात आठ साल पहले की बात है. तब मैं आठवीं मैं पढता था. मेरे एक दोस्त ने मुझे राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के बारे में बताया. हम दोनों रोज तडके सुबह उठ कर शाखा में जाने लगे. वहन पर विभिन प्रकार के खेल खेलते, व्यायाम करते, और कहानियाँ सुनते थे. संघ में हम इतना रम गए की मैंने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर दूसरे गाँव में संघ की संध्या शाखा शुरू कर दी. हम दोनों चोरी छुपे, घर वालों को बिना बताए शाम को स्कूटर पर बैठ कर उस गाँव में पहुँच जाते और अपने सहपाठियों और अन्य लड़कों के साथ मिलकर शाखा चलाते थे.. फिर दो महीने की छुट्टियाँ हुई. हमारे संघ के जिलाप्रमुख जी ने हमें कहा कि ७ दिन का प्रशिक्षण शिविर (शिविर का नाम तो मुझे याद नहीं) लगेगा उसमें भाग लो.. मैं तो भाग नहीं ले सका लेकिन मेरे मित्र ने भाग लिया. शिविर के वाद जब मैं उससे मिला तो उसने बताया कि शिविर मैं ऐसी ऐसी कहानियाँ सुने जाती थी कि हमारा खून खौल जाता था और दिल करता था कि अभी बंदूक उठा कर मुसलमानों को मार डालूं..

इस तरह कि कई बाते हुई संघ मेरे दिल से उत्तर गया और मैंने इससे तौबा कर ली.. अब दिल्ली मैं हूँ, मेरे कई दोस्त आज भी हिन्दू मुस्लिम मैं जंग की बातें करते हैं... एक तरफ तो कहते हैं की सब कुछ भगवान् ने बनाया है और फिर उसी के वन्दों में कमी निकलते हैं.. कुछ लोग बचपन मैं ही जहर घोल देते है ताकि नफरत कि फसल उग सके..

8 comments:

samshad ahmad 7 May 2008 12:45 PM  

सिर्फ आर एस एस ही नहीं सिमी जैसे संगठन भी हैं मुझे तो आजतक ये समझ नहीं आया आख़िर ऐसे संगठनों की जरुरत क्या है. क्यों ऐसे विचारों वाले लोग शान्ति से नहीं रह सकते और क्यों शान्ति से नहीं रहने देते.

राज भाटिय़ा 7 May 2008 1:07 PM  

जियो सुनील जियो यह सारे संगठन, अपना उल्लु सीधा करते हे, ओर सीधे साधे नागरिको को तबाह करते हे, जब राम रहीम एक हे तो झगडा किस बात का,बेअकल लोगो का काम हे,

Dr.Parveen Chopra 7 May 2008 5:54 PM  

जियो सुनील जी, जुग जुग जियो....आप की पोस्ट ने हिला दिया...काश, आज की सारी पीढ़ी की सोच आप जैसी बढ़िया हो जाये। दोस्त, अब मेरा भी एक अनुभव सुनो.....सुनील, मैं भी आप की तरह इस सारी काइनात के बंदों के साथ बेहद प्यार करता हूं ....मुझे किसी के धर्म से कोई सरोकार नहीं, कोई की जात से , किसी के वर्ण से कोई सरोकार नहीं....मेरे लिये भी दोस्त हर जीव उस परम-पिता का ही स्वरूप है। बात कुछ यूं है कि दोस्त मुझे कुछ साल पहले मेरा एक मरीज मुझे एक किताब थमाते हुये कहता है कि डाक्टर साहब, यह किताब आपने ज़रूर पढ़नी है, यह किताब ऐंटी-मुस्लिम है...और इस में लिखी कईं बातें आप की आँखें खोल देंगी। मैंने तो पहले मन ही मन उस शख्स ( चाहे मरीज था तो क्या !) को गाली निकाली ....धत्त तेरे की...इतनी घटिया सोच.....लेकिन तुरंत ही बिना उस किताब को खोले ही मैंने उसे लौटाते हुये यह कहा कि देखो, भई मुझे इस तरह की किताबों में कोई रूचि नहीं है.....इस तरह का लिटरेचर पढ़ कर क्यों करूं अपना मन प्वाईज़न.....Hell with such writers who spit communal venom through their pens.....!
सुनील जी, उस दिन के बाद वो महांपुरूष मेरे पास कभी आया ही नहीं....और मुझे आज भी गर्व है कि मैंने उस पुस्तक का पहला पन्ना भी ना देखा।
एक बार फिर आप की इस पोस्ट के लिये तहे दिल से शुक्रिया। खुश रहो, आबाद रहो........
ऊपर लिखी राज भाटिया जी की टिप्पणी पढ़ कर भी अच्छा लगा। हम जब कश्मीर के गुमराह नौजवानों के परिवार जनों की हालत मीडिया में पढ़ते हैं, देखते-सुनते हैं तो मन दहल जाता है, लेकिन इन जवानों के भी मेन-स्ट्रीम पर आने की दुआ दिल से करते ही रहते हैं।

Udan Tashtari 7 May 2008 7:51 PM  

सही किया-अलग हो लिये. यह सब कुंठाग्रस्त अभियान हैं..सही अभियान से जुडो...इसे देखो:

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आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

एक नया हिन्दी चिट्ठा भी शुरु करवायें तो मुझ पर और अनेकों पर आपका अहसान कहलायेगा.

इन्तजार करता हूँ कि कौन सा शुरु करवाया. उसे एग्रीगेटर पर लाना मेरी जिम्मेदारी मान लें यदि वह सामाजिक एवं एग्रीगेटर के मापदण्ड पर खरा उतरता है.

यह वाली टिप्पणी भी एक अभियान है. इस टिप्पणी को आगे बढ़ा कर इस अभियान में शामिल हों. शुभकामनाऐं.

Neeraj Rohilla 7 May 2008 8:38 PM  

सुनीलजी,
बढिया आलेख, थोडी आंखे हिल रही हैं, इसलिये नहीं कि आपके लिखे से हिल गयी, बल्कि इसलिये कि १० किमी दौडने और ४-५ बीयर दाबने के बाद कुछ बोझिल सा हूँ ।

मैं कक्षा १ से ८ तक सरस्वती शिशु/विद्या मंदिर में पढा हूँ और आज मेरे दोस्त मुझको कम्यूनिस्ट कहकर सताते हैं । निश्चित मानिये कि संघ ने बहुत से अच्छे काम भी किये हैं, लेकिन वो अभी भी कहीं अटके हुये से हैं, जितना जल्दी चेत जाये उतना अच्छा ।

मैने शाखा प्रबन्धक से लेकर खुद श्री सुदर्शनजी को पास बैठकर सुना है । कुछ बाते हैं जो संघ मानने को तैयार नहीं है । जातिवाद के नाम पर उल्टे सीधे तर्क सुने हैं संघवालों से, क्यों हम एक स्वर में आज भी नहीं मानते कि जाति-वर्णवाद गलत है ।

संघवादियों का हिटलर के प्रति प्रेम मैं आजतक समझ नहीं पाया । और भी ऐसी बातें हैं लेकिन फ़िर कभी के लिये रोक रहा हूँ ।


आपकी लेखनी सशक्त है, आगे भी लिखते रहें ।

साभार,

rakhshanda 7 May 2008 10:16 PM  

सभी संगठनों का सीधा सा मकसद है,दिलों को बाँट कर आपस में नफरत पैदा करना,ऐसे इंसानियत के दुश्मनों को सबक आप जैसे लोग ही दे सकेंगे.बहुत अच्छा लगा पढ़ कर,thanks

कामोद 7 May 2008 10:23 PM  

बहुत अच्छा किया जो अलग हो गए नहीं तो नफरत की आग में आज आप भी सुलगते रहते. अच्छा लेख. लिखते रहिये ......

SUNIL DOGRA जालि‍म 9 May 2008 12:10 PM  

यह पोस्ट मैंने यूँ ही कर दी थी.. लेकिन जिस तरह आप लोगों ने प्यार उंडेला उससे मैं बहुत उत्साहित हूँ. इसकी आशा हालांकि मैंने नहीं की थी..

@samshad ahmad

महोदय बहुत सही कहा आपने, मेरी मानें तो राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुँचने वाले हर संगठन पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए..

@राज भाटिया

आपने तो सदा ही मेरा उत्साह बढाया है, बहुत बहुत धन्यवाद जी

@Dr.Parveen चोपडा

डाक्टर साहब, बिलकुल सही कहते हैं आप, आपको भी बहुत बहुत धन्यवाद..

@समीर जी

आप के अभियान के साथ तो हम मन, कर्म, वचन से जुड़ें है. निश्चिंत रहें..

@ नीरज जी
मैं भी सरस्वती विद्या मंदिर का छात्र रहा हूँ.. लेकिन संघ के प्रति मैंने अपनी भावना तो प्रकट कट ही दी है.

@rakhshanda जी, धन्यवाद तो मुझे आपका कहना चाहिय

@कमोद जी आपको भी बहुत बहुत धन्यवाद

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