कान पकाऊ महिला सशक्तिकरण..
>> Saturday 10 May 2008
जेपी आन्दोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण एक नारा लगते थे. 'इनसे नहीं लड़ाई है पुलिस हमारा भाई है' कितना सुखद नारा था.. आजकल कोई भी अगर आगे बदने की, मज़बूत होने की कोशिस करता है तो न जाने क्यों किसी की छाती पर पांव रखकर ही रास्ता बनाता है..
नारी शक्ति मजबूत हो, हम भी यही चाहते हैं लेकिन महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली फौज अनावश्यक रूप से मर्दों को अपना शत्रु मान लेती है. न जाने उन्हें क्यों लगता है की हर समस्या का हल पुरुषों को कोस कर ही निकल सकता है. मुझे इस विचार से चिड होती है.. दुश्मनी बांधकर रास्ता मुश्किल होता है... फिर यहाँ फिर यहाँ घोडा और घास जैसी तो बात है नहीं को दोस्ती नहीं हो सकती.. दरअसल आगे बदने की होड़ मैं उचित रह न मिलने पर लोग गुमराह हो जाते हैं.. यही बात हर जगह लागु है.. महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले लोग आज पुरुषों को गाली निकलते हैं...
ऐसी ही हालत रही तो वो दिन दूर नहीं जब पुरुष सशक्तिकरण की बात करनी पड़ेगी
और ऐसा हो भी रहा है.. कल तक दलितों को आरक्षण की बात होती थी, लेकिन दलितों को आगे लेन के चक्कर मैं अगडों को पीछे धकेल दिया गया और आज गरीब अगडों के लिए भी आरक्षण की बात होती है...
जरा सभंल कर...


7 comments:
सुनील बात आप की बहुत उचित हे, लेकिन जहा तक मे सोचता हु यह आवाज मर्दो को अपना दुशमन सिर्फ़ वही कहती हे जिन्हे मर्द घास भी नही डालना चाहते,जब बात बात मे मर्दो को गालिया दे गी तो मर्द अपनी इज्जत के लिये चुप तो रहे गा, लेकिन उसे ओर उस की बतमिजियो को नजर आंदाज ही करे गा, लेकिन सभी स्त्रिया ऎसी नही, हमारे तुमहारे घर मे भी तो स्त्रिया हे,ओर सभी तो सिर फ़िरी नही, क्यो की सभी को मालुम हे बिना एक दुसरे के दोनो ही बेकार हे, इस लिये मस्त रहो भाई, ओर इन से दुरी ही भली :) :) :):)
सुनिल जी हम आप की बात से 100% सहमत हैं राज जी की बात से नहीं। हम भी मानते हैं कि नारी सशक्तिकरण का मतलब मर्दों को दबाना या मारना नहीं।
नारी कि जागरूकता , नारी कि आवाज , नारी कि सोच , नारी का कैरियर , नारी कि तरक्की , नारी कि समानता को जब तक समाज उसे " नारी कि पुरूष से प्रतिस्पर्धा का नाम देता रहेगा " सब को महिला सशक्तिकरण एक पुरूष विरोधी आन्दोलन लगता रहेगा ।
ये तो एक व्यापक सोच है,यदि पुरुष नारी को शुरु से ही सारे अधिकार देता, उसका उत्पीडन ना करता तो नारी सशक्तिकरण जैसा आंदोलन ही क्यूं छेडा जाता.वैसे आम तौर पर नारी और पुरुष एक ही गाडी के दो पहिये माने जाते हैं,अपवाद स्वरूप ही कोई नारी किसी मर्द को दबाती है या शोषित करती है.हम महिलाओं की मर्दों से कोई दुश्मनी नहीं.
सशक्तीकरण का अर्थ ही है कि जो अशक्त है उसको सबल बनाना.क्या परिवार का सुख एक स्त्री के निर्बल बने रहने में ही है? यदि परिवार या समाज के एक वर्ग को अबल या निर्बल रखने से दूसरों को सुख मिलता है तो अवश्य मामला सामन्तशाही का है. वरना कौन नहीं चाहेगा कि स्त्री सबला हो,वह स्त्री जो समाज को,संस्कृति को,परिवार व घर को बचाती है,वह अशक्त व वन्चित रहे....? जरूर मामला गड़बड़ है.उसकी तेजस्विता से घब्रराएं नहीं. हमारी आने वाली नस्लों की बेहतरी स्शक्त माओं के हाथ में ही है,वरना सोचिए कि कल को हमारी बेटियों को कोई भी कोई भी भरभरा कर रोने के लिए यदि विवश कर दे तो वे कैसे जीवनयापन करेंगी. इस पशुवत् होते समाज में उन्हें कमजोर होकर जीना (बल्कि मरना) होगा ना?मन्जूर है आपको यह?
इस लिए आप पुरुष पक्ष में न रह कर जरा स्त्री पक्ष में खड़े होकर स्वयम् पर बिता कर कल्पना कर देखिए, फिर जी चाहे शास्त्रार्थ करिए.
सुनील जी
आपको महिलाओं के संगठन से ऐतराज़ क्यओ है? चलने दीजिए। ये पुरूष विरोधी नहीं बल्कि नारी सशक्तिकरण है। और अगर महिलाएँ अपनी कुछ बातें मिल बाँट कर कह लेती हैं तो बुराई क्या है? राज जी, आप इसतरह से महिलाओं पर कटाक्ष ना करें । नारी घर की हो या बाहर की सम्मान की अधिकारी है। नारी का सशक्तिकरण किसी के विरूद्ध नहीं है। हम सब भी यही मानती हैं कि नारी और नर एक दूसरे के पूरक हैं और बिना कारण कोई विरोध नहीं। जहाँ नारी पर कोई अत्याचार होता है वहाँ आपको भी हमारी आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाकर विरोध करना चाहिए। आपस में व्यर्थ का विवाद करने से कोऐ लाभ नहीं।
@ राज भाटिया जी आपकी बात उचित है, हाँ लगता है इस बात को अन्यथा मैं ले लिया गया.. खैर, सचमुच महिला सम्मेलन ही हो गया...
@anitakumar जी, मेरी बात का समर्थन करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद,
@रचना जी, आपकी बात काबिलेगौर है.. लेकिन यह भी काबिलेगौर है कि कौन नारी कि लड़ाई को पुरूष से प्रतिस्पर्धा का नाम दे रहा है..
@Ila जी, आपकी बात को द्न्यवाद सहित पूरा समर्थन है...
@डॊ. कविता वाचक्नवी जी, आपकी बात में दम तो है लेकिन मैंने बहुत सोच समझकर ही लेख लिखा था, यकीन मनिय मैं भी महिला सशक्तिकरण का विरोधी नहीं हूँ... लेकिन पुरुष शर्त्रू नहीं मित्र हैं...
@शोभा जी, आप गलत समझ रही हैं, ऐतराज बिलकुल नहीं है... बल्कि ख़ुशी है महिलाओं के बदने की ....हम तो आपका साथ देने के लिय ही अपनी बात कह रहे हैं.....धन्यवाद
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