काश! मैं मुसलमान होता...

>> Tuesday 1 July 2008

एक हिन्दू होने के नाते मैं हमेशा जानने का प्रयास करता था कि मुसलमान कैसे होते हैं? लेकिन चूँकि मैं हिमाचल से हूँ और वहाँ मुसलमान न के बराबर होते हैं इसलिए मेरा यह सपना आसानी से पूरा नहीं हो सका. फिर पढाई के लिए दिल्ली आने का मौका मिला तो मुसलमान मित्रों से संपर्क हुआ. लेकिन जब भी धर्म सम्बन्धी चर्चा उठती तो कोई न कोई अड़चन आ जाती. यह तो मैं कभी समझ ही नहीं सका की एक मनुष्य को किस मूल आधार पर हिन्दू या मुसलमान करार दिया जाता है. मैं सबसे यही कह रहा कि कृपया मेरे प्रश्न को हल कर दें

अभी हाल ही में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने का मामला भी खूब भड़का. जम्मू और कश्मीर दो हिस्सों में बाँट गये.. दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी. इस मसले पर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने लिखा 'कश्मीर में १ लाख लोग सड़कों पर बोर्ड को जमीन देने के विरोध में उत्तर आये, वह कश्मीर कि आज़ादी और पाकिस्तान के लिए नारे लगा रहे थे'. बाद में मुझे किसी ने बताया कि वह 'लोग' नहीं थे बल्कि 'मुसलमान' थे. एक अमरनाथ यात्री ने मुझे बताया था कि यह यात्रा तो धार्मिक सदभाव का उत्तम उदाहरण है. यात्री हिन्दू होते हैं और यात्रा में मददगार लोग मुसलमान होते हैं. स्थानीय मुसलमान लोग घोडों, पालकियों और पैदल सामान और यात्रिओं कि सवारी के रूप में मदद कर अपना गुज़ारा चलते हैं...

फिर भी इतना फर्क पैदा हो जाता है कि उम् उनसे नफरत करते हैं. मेरी अल्प विकिसित बुद्धि में यह बात समझ नहीं आती. इसलिए सोचता हूँ कि काश में मुसलमान होता ताकि उनका पक्ष भी समझता. और अपना पक्ष भी देखता और जानने कि कोशिश करता कि समस्या कहाँ है...
अगर आप को पता हो तो कृपया मेरे प्रश्न को हल कर दें

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