सोमनाथ दा की 40 सालों की निष्ठा और देशभक्ति का सिला..

>> Wednesday 23 July 2008


भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने अपने दल के बडे नेता और लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकल दिया. लगभग पिछले ४० सालों से पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्त्ता से ऐसा व्यव्हार उचित नहीं था. सोमनाथ चटर्जी ने अगर लोकसभा अध्यक्ष पद नहीं छोड़ा तो ठीक ही किया. पहला कारण तो यह की वह श्रेष्ठतम लोकसभा अध्यक्ष हैं.


एक समय तक हमारे देश के लोकसभा अध्यक्ष यह पद सँभालने के बाद अपनी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र दे देते थे. समय बदलने के साथ यह परम्परा तो समाप्त हो गयी परन्तु लोकसभा अध्यक्षों ने यह पद सँभालने के बाद पार्टी से अघोषित रूप से कभी भी ताल्लुक नहीं रखा. वह पार्टी में होते हुए भी पार्टी से सम्बन्ध नहीं रखते थे.


सन १९९८ में जब वाजपेयी की सरकार महज एक वोट से विश्वास मत हर गयी थी तो उस समय लोकसभा अध्यक्ष स्वर्गीय बालयोगी जी थे. वह तेलगुदेशम पार्टी से थे तथा उस समय तेलगुदेशम पार्टी बाहर से वाजपेयी सरकार को समर्थन दे रही थी. अगर बालयोगी जी पद छोड़कर सरकार के समर्थन में वोट देते तो सरकार को गिरना नामुमकिन था. लेकिन उन्होंने भी दवाब को ना मान कर अपने पद की लाज़ राखी थी.


इधर भी स्थिति बहुत अलग नहीं थी. माकपा चाहती थी की सोमनाथ लोकसभा अध्यक्ष का पद छोड़ कर सरकार के खिलाफ वोट करें. सोमनाथ से अपनी 'जिम्मेदारी' निभाई. और पार्टी ने उन्हें निकल दिया. स्पष्ट है की देश बड़कर पार्टी को ही माना जाता है.


अब शायद सोमनाथ दा चुनाव ही ना लडें. लेकिन मुह्जे मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया की क्यों कामरेड सोमनाथ को माकपा की पोलित ब्यूरो में नहीं रखा गया था. (२००४ में लोकसभा अध्यक्ष बनने से पहले सोमनाथ दा पोलित ब्यूरो में नहीं थे) साफ़ है की ४० सालों तक देश के इकलोते देशभक्त वामपंथी नेता माकपा में घुटते रहे.


सुभाष चन्द्र बोस भी वामपंथी थे. मुझे पूरा यकीन हैं की अगर आज वह होते तो यह वामपंथी उन्हें अपनी पार्टी में नहीं रख पाते.

5 comments:

सुशील कुमार छौक्कर 24 July 2008 9:50 AM  

आजकल देश से बड़ा "मैं" हो गया हैं।

कुमार आलोक 25 July 2008 1:32 AM  

४० सालों से दल के प्रति निष्ठावान रहें इसमें कोइ दो राय नही लेकिन दल उनसे उपर है उन्हे स्वेच्छा से अपने पद का त्याग करना चाहिये था ..

Sanjay Sharma 25 July 2008 2:21 AM  

सोमनाथ जी को निर्विरोध राष्ट्रपति चुना जायेगा .ऐसी सम्भावना कोरी नही है . सीताराम जी और प्रकाश करात जी उनके दरवाजे तक दौडे जाने को आतुर होंगे .समीकरण तो यही कह रहा है इसी के तहत उनके लंबे जीवन की कमाना है उनके जन्म दिन पर .

राज भाटिय़ा 2 August 2008 3:46 AM  

भाई इस बारे हम सिर्फ़ मुक हे,

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