ऐसा भी क्या था गाँधी में...

>> Thursday 2 October 2008


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जैसे जैसे मैंने होश संभाला, मेरे मन यह प्रशन गहराता गया कि आखिर उस अधनंगे फ़कीर ने ऐसा भी क्या किया था कि उसका इतना नाम हो गया. था क्या उसमें ऐसा..

सचमुच बापू ने जो किया वो सब तो स्यवं भगवान् भी धरती पर नहीं कर सके. जब बापू पढने के लिए इंग्लैंड जाने लगे तो उनकी मां ने उनसे तीन वचन मांगे. मांस नहीं खाओगे, शराब नहीं पियोगे और परायी स्त्री पर बुरी नज़र नहीं डालोगे.. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था. जब बापू समुद्री जहाज में बैठे तो उन्हें पता चला कि पुरे जहाज़ में खाने के लिए कोई शाकाहारी पकवान तो है ही नहीं. पुरे समय में उन्होंने सलाद और मिठाईयां खा कर गुजरा किया. इतना ही नहीं. इंग्लैंड पहुँच कर तो और भी बुरी हालत हो गयी. वहां जिन महोदय के घर वो रहते थे उन्होंने बापू को लाख समझाया कि यहाँ कि ठण्ड का मुकाबला शराब और मांस के बगैर नहीं हो सकता लेकिन बापू अडिग थे. उन्हें भूखे सोना पसंद था लेकिन मांस खाना नहीं.

दक्षिण अफ्रीका में पहुँच कर उन्होंने नमक खाना छोड़ दिया, फिर ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए दूध भी त्याग दिया और भारत लोटने तक कपडे भी छोड़ दिए. वो सिर्फ हाथ से काते सूत के कपडे ही पहनते थे. उन्होंने अन्न का भी त्याग कर दिया और सिर्फ कंद मूल के सहारे रहने लगे. सत्ता का तो उन्हें कभी लोभ था ही नहीं.

बापू कि सबसे अच्छी बात थी कि उन्हें उनके सिद्धांत पता थे. और जीवन भर उन्ही के रस्ते पर चले.. जरा इत्मीनान से सोचिये भला कोई व्यक्ति कैसे सत्य और अहिंसा के सहारे 'सब कुछ' पा सकता है और इस्ससे भी ज्यादा, कैसे यह प्राण निभा सकता है. मिझे यकीन नहीं होता कि कोई भी, जी हाँ कोई भी इंसान ऐसा कर सकता है.. अगर बापू इंसान होते तो शायद बह भी नहीं कर पते वो तो भगवान् थे....

वैष्णव जन तो तेने कहिये,
जे पीड पराई जाणे रे।।

पर दृखे उपकार करे तोये,
मन अभिमान न आणे रे।।

सकल लोकमां सहुने वंदे,
निंदा न करे केनी रे।।

वाच काछ मन निश्चल राखे,
धन-धन जननी तेनी रे।।

समदृष्टी ने तृष्णा त्यागी,
परत्री जेने ताम रे।।

जिहृवा थकी असत्य न बोले,
पर धन नव झाले हाथ रे।।

मोह माया व्यापे नहि जेने,
दृढ वैराग्य जेना मनमां रे।।

रामनाम शुं ताली लागी,
सकल तीरथ तेना तनमां रे।।

वणलोभी ने कपटरहित छे,
काम क्रोध निवार्या रे।।

भणे नरसैयों तेनु दरसन करतां,
कुळ एकोतेर तार्या रे।।

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