अरे भाई! धारा 377 बनाई ही क्यों थी...???

>> Sunday 5 July 2009


समलैंगिक संबंधों पर आजकल बहस जोरों पर है. मुद्दा भी कुछ ऐसा ही है. भारत जैसे देश में इतनी जल्दी गे-सेक्स की छूट मिलने के आसार नहीं लग रहे थे लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट के समलैंगिकों के हक़ में फैसले से अचानक क्रन्तिकारी बदलाब आ गया. क्रन्तिकारी इसलिए क्योंकि जिस देश में बहुत हद तक जहां प्रेम विवाह करने तक की इजाज़त न हो और हर साल अपने ही मां-बाप और परिजनों के हाथों कई लड़कियों और लड़कों की हत्या हो सिर्फ इसलिए हो जाती हो क्योंकि 'नासमझ' औलाद ने प्रेम करने का 'पाप' किया हो. ऐसे में गे सम्बन्ध आसानी से लोगों के जहाँ में उत्तर जायेंगें यह सोचना भी बेमानी होगी. अगर किसी को शक को तो जरा देहात की और रुख करके देखे ...बहुत से लोगों को पता भी नहीं होगा की आखिर समलैंगिकता क्या बला है.
सवाल यह है की आखिर गे संबंधो को नाजायज बताने वाली धारा 377 को पूरी तरह ख़त्म कर दिया जाये या नहीं. लेकिन मेरा सवाल यह है की इस उल-जलूल किस्म की धारा बनाने की ही क्या जरुरत थी. दरअसल यह कानून उस समय बना था जब भारत अंग्रेजों के अधीन था. सन 1860 में लोर्ड मैकाले ने इस कानून को तैयार किया था.यह वही मैकाले है जिसकी शिक्षा नीतियों की दक्षिण पंथी दल बहुत निंदा करते हैं. खैर, जब भारत आजाद हुआ तो भी इस धारा को उसी रूप में स्वीकार कर लिया गया. सोचने लायक बात यह है की उस ज़माने में जब भारत पर 'संन्यास' और 'काम' से मुक्ति यानि प्राकृतिक यौन संबंधों को ही त्यागने की बात होती थी तब इस अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में डालने और दस साल से लेकर उम्रकैद की सजा का प्रावधान करने की क्या जरुरत थी. यह अलग बात है की इस कानून के तहत किसी को सजा होने का मामला आज तक प्रकाश में नहीं आया. जबकि समलैंगिक सम्बन्ध कायम होना कोई नई बात नहीं है. हाँ , दिल्ली हाईकोर्ट के गे संबंधों को अपराध न मानने के फैसले से बहुत से ऐसे भी गैर-समलैंगिक लोग सहमत हैं जो न चाहते हुए भी इस फैसले का विरोध कर रहे हैं.
इसे भारत का दुर्भाग्य कहा जाये या सोभाग्य कि सीपीएम के अलावा देश कि कोई भी राजनैतिक पार्टी इस फैसले का स्वागत करने या इस पर बहस करने कि बात कहने का सहस नहीं जुटा सकी हर राजनैतिक दल या तो असमंजस से घिरा हुआ नजर आया या खुल कर विरोध में खडा हुआ. आश्चर्य यह हुआ कि प्राकृतिक सेक्स से भी दूर रहने का दावा करने वाले 'बाबा' और साधू संत तक भी इस 'तथाकथित' अप्राकृतिक रूप का विरोध कर रहे हैं. मुझे सिर्फ युवा सांसद सुप्रिया सुले कि बात जच रही कि यह लोगों का बहुत ही निजी मामला है. किसी को भी अपने ढंग से जीने का अधिकार है (समलैंगिकों को भी), हाँ भारतीय संस्कृति कि सीमायों का ख्याल रखना जरुरी है.

7 comments:

Neeraj Rohilla 5 July 2009 2:10 PM  

आपके सुलझे हुये विचार पढकर अच्छा लगा। चलिये इसी बहाने कम से कम मैकाले कुछ पुण्य कमा लें, वैसे बहुत गालियाँ खायी हैं उन्होनें।

राज भाटिय़ा 5 July 2009 3:14 PM  

यह लोगों का बहुत ही निजी मामला है. किसी को भी अपने ढंग से जीने का अधिकार है (समलैंगिकों को भी), हाँ भारतीय संस्कृति कि सीमायों का ख्याल रखना जरुरी है. बहुत सुंदर विचार है आप के लेकिन ""किसी को भी अपने ढंग से जीने का अधिकार है तो एक चोर को भी, एक ब्लातकारी को , एक डाकू को, एक रिशवत खोर को, एक व्याहता आदमी को भी, एक ओरत को भी
जालिम भाई आप के विचार बहुत अच्छे है , चलिये मान लिया हम पिछडॆ विचारो के है अब जरा बतलाईये कि यह "भारतीय संस्कृति कि सीमायों "" यह सीमाये कोन सी है, यह भारतीय संस्कृतिक क्या है
भारत को दुनिया आज तक सिर्फ़ इस लिये महान समझती है क्योकि यहां आज तक यह गंदगी नही आई, कुछ अपवादो को छोड कर यहां नारी पुजी जाती है, रखेल ओर पेर की जुती नही होती
आप के विचार बहुत सुंदर लगे

धन्यवाद

mahashakti 5 July 2009 6:35 PM  

सार्थक लेख , जरूरी है कि समलैंगिको कि अपनी मर्यादायें, मर्यादाओं के बाहर यह अपच टाईप का होगा। इसका प्रदर्शन सड़क पर ठीक नही।

शाश्‍वत शेखर 6 July 2009 10:19 AM  

कानून कि सहमति भले मिल जाये, लेकिन क्या समाज अपनायेगा इन्हें? अवसाद ग्रस्त लोग और दुखी होगें।

आर्य मनु 26 November 2009 6:47 AM  

प्रणाम स्विकार करें...
सबसे बड़ी बात....अभी तक इस विषय पर पिछले कुछ samay से दर्जनों लेख पढ़ चूका हु...
पर आपकी कलम इतनी सधी थी माने...ख्नाड़े की धर पर चल रही हो..
न थोड़ी सी इधर न थोड़ी सी उधर....
सच में संपादक बन गए है आप....
एक चीज़ सोचने लायक है...कोई घर में बैठकर अगर निम्बू का अचार खाए या आम का...बहार वालो को क्या तकलीफ होगी ??? फिर इस विषय को इतना क्यों उछाला जा रहा है???
आपने लिखा है...ग्रामीण परिवेश को नहीं पता की "गे" आखिर बला क्या है.... मैं कहूँगा...कई शहरियों..खासकर तरुण होते बच्चो को भी पूरी तरह से नहीं पता होगा....
पर अब...
मैंने उदयपुर से पुणे आते वक़्त किसी १७ साल के बच्चे के मुह से सुना...."try करने में क्या हर्ज है..हिंग लगे न फिटकरी...रंग चोखा आये..."
खैर..
इतने दिनों बाद किसी ब्लॉग पर लिखा है...गलतिया स्वाभाविक है..
आशा है , माफ़ करेंगे.

आर्य मनु
0mmanuudaipur@gmail.com

Prabodh Kumar Govil 3 July 2011 3:45 AM  

aapne santulit dhang se samasya par likha hai. soch ko vyapak banaane ke liye aise muddon ko uthana zaroori hai.

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