दिल्ली की बसों में सेफ नहीं है 'लड़कों' की इज्ज़त
>> Tuesday 8 September 2009

समलैंगिकता पर बहस छिडी तो पुरानी पीढी ने नये दौर के बच्चों पर संस्कृति को खराब करने के आरोप लगाने में जरा भी रहम किया. लेकिन अगर आप दिल्ली की सड़कों पर सार्वजानिक वाहनों पर निर्भर होकर निकल जाएँ तो हकीकत नजर आज जायेगी. पहले मुझे लगता था की छेड़खानी की वारदातें सिर्फ महिलायों के साथ ही होती हैं. लेकिन...! ऐसा आभास होता है कि समलैंगिकता तो हमारी संस्कृति कि जड़ों में मोजूद है.. यहाँ दिल्ली कि बसों के कुछ अनुभव बाँट रहा हूँ...
बाहरी मुद्रिका दिल्ली परिवहन निगम कि एक ऐसी बस है जो राजधानी कि हर छोर को स्पर्श करती है. इसी बस कि दास्तान है. बहुत ताज़ी. एक युवक डीटीसी कि पुरानी बस में चडा. बस खूब भरी हुई थी. युवक सबसे पिछली सीट के पास खडा हो गया. वहां एक अधेड़ व्यक्ति बैठे हुए थे. खूब तगडे और रोबदार मूछें. उम्र लगभग साठ साल. मनो फौज से रिटायर आदमी हो. वो जरा से सरके और उन्होंने युवक को बगल में बैठा लिया. युवक की तरफ देख कर वो जबरदस्ती मुस्कुरा रहे थे. उनके हाथ में एक मीडियम साइज़ का हैंडबैग था. जिसका एक छोर युवक की टांग के ऊपर था. और उस आदमी का हाथ उस बैग के उसी हिस्से पर था. युवक ने धीरे-धीरे हाथ में कुछ हलचल महसूस की. उस आदमी की तिरछी नजरें बार बार 'निशाने' को घूर रही थी. और हाथ कुछ टटोलने को लगातार बाद रहा था. तभी खुदा मेहरबान हुआ और सेकंड लास्ट सीट खली हो गयी. यह सीट अक्सर सिंगल सीट होती है. युवक गिद्ध की तरह झपट कर उस सीट पर विराजमान हो गया. लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई. उस आदमी के बगल में एक और नौजवान बैठ गया. फिर से वही खेल शुरू हुआ. लेकिन यह नौजवान इतना भाग्यशाली न था या वह भाग्यशाली होना नहीं चाहता था. कुछ देर बाद उस आदमी का हाथ नौजवान के अंगो पर चल रहा था और उन्हें सहला रहा था. और वो नौजवान अपने मोबाइल में आराम से गेम खेल रहा था.
हाँ, यह अकेला अनुभव नहीं है. लिस्ट लम्बी है. लेकिन यहाँ के लिए एक ही काफी है. एक और बात. हर किस्से में बात समान है कि छेड़खानी करने वाला आदमी साठ साल कि उम्र से कम न था. ...........


13 comments:
बाप रे.... तभी तो मे डर के मारे कभी इन बसो मै नही बेठता...
इजजत सब को प्यारी है, हम तो लूटने पर रिपोर्ट भी नही लिखवा सकते
क्या बात है ज़ालिम जी, बडे दिनों बाद नज़र आयें कहां थे इतने दिनॊ से?????
ये कोई नयी बात नही है...हर शहर में ऐसा होता है हमारे यहां भी है
बिल्कुल सही नब्ज पकड़ी है, यही हाल इधर मुंबई लोकल में भी कई बार देखने को मिल जाता है।
सही फ़रमाया आपने,
पर इनको ये सब करने की अब क्या जरुरत है धरा ३७७ तो लागु हो चूका है. खुलकर अपना गे साथी बनाये.. यु छुप छुप कर क्यों, संभावना सेठ या सेलिना से भी हेल्प ले सकते है ये..
छोटी छोटी पहलुयो को उजागर करने के लिए मुबारक, लिखते रहे...
hahahahaha........ bada achcha aur ajeeb laga padh ke.....
हरेक काम में अब बराबरी से जो होता है...
जो है वो सही लिखा है.
यह ताजा तो नहीं मग़र बयार में बहाने लगा है...
और इक़ दिन यह "बड़े" रूप में दिखेगा...
यही होता है धीरे-धीरे का परिवर्तन...फिर एक विस्फोट!
लिखते रहिये...शुक्रिया.
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क्या बात है ...itani choti umar mein ye tevar ....!!
आप ने महत्वपूर्ण और सारगर्भित मुद्दा उठाया है..
Uff ! kya kahun? khair...ek stree hone ke naate, kabhi kabhi lagta hai,ki, ladkon kee bhee kabhi kabaar chhedkhanee honee chahiye!
"क्षमा जी" लडको के पीछे क्यों पड़ गयी???
जालिम साहब...ये कोई नया खेल नहीं है इन कर्नल साहबों का....
राजस्थान रोडवेज की जयपुर-उदयपुर बस में मैं भी एक बार लुटते लुटते बचा हु....
भगवन बचाए......अब तो मुस्कुराते बुजुर्गो के पास बैठने में भी डर लगता है...
आपका शब्द चयन करने का तरीका अच्छा लगा...
बचकर रहे......बचाव ही उपचार है...
आर्य मनु, उदयपुर
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bhai mana ki badi problem hai
Par aise dar ke kya hoga
In budhoon ko pakdo kabhi
nahe to ye aise he krte rahenge
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