जब कुंदन बन जायेंगे दिबांग!

>> Monday 11 January 2010


तो अब मुकाबला नहीं होगा। होगा भी तो मजा नहीं आएगा। दिबांग जो नहीं होंगे. एक कहावत है। जब बड़े दरख्त गिरते हैं तो धरती हिलती है. बरगद में तो हलचल होने से भी धरती कांपती है। दिबांग भी बरगद हैं। सुना है अब उनका एनडीटीवी से नाता टूट गया है। ब्लॉग जगत में बड़ी हलचल है। हर कोई अपनी भड़ास निकल रहा है। लेकिन वनवास तो राम कों भी भोगना पड़ा था। दिबांग राम नहीं हैं। राम जैसे भी नहीं हैं। फिर भी वह उर्जा के स्त्रोत हैं। सूरज भी आठ से दस घंटे चमकने के बाद मंद हो जाता है। दिबांग नहीं। उन्हें जानने वालों कों मालूम है कि दिबांग बिना थके घंटों तक काम करते हैं। भूख प्यास कि कोई फ़िक्र नहीं। जूनून का दूजा नाम हैं दिबांग। बिना ब्रेक 18 घंटे तक काम करने के बाद भी दिबांग इतने फ्रेश लगते हैं मनो अभी नहा के आयें हों। टीवी पर इतना सीधा-साधा कोई दूसरा चेहरा नज़र नहीं आता जिसमें इतनी एनर्जी हो। कैमरे के सामने चीता भी उनका मुकाबला नही कर सकता। भड़ास 4 मीडिया pआर उन्हें निकले जाने कि सूचना देते हुए यशवंत लिखते हैं कि एनडीटीवी वाले अब उनके छिलके निचोड़ रहें हैं। अहो भाग्य! जरा सोचिये, जिस आदमी के छिलके इतने रसदार हैं वो भीतर से तो मीठा सागर होगा।

ढाई साल पहले जब दिबांग कों सिर्फ मुकाबला तक सिमित किया गया था तभी से असर भी दिखना शुरू हो गया था। क्लास कि बात करने वाले चैनल अब ग्लेमर और यूटयूब के सहारे टीआरपी जुटाते दिखते हैं। लोग कहते हैं कि दिबांग अक्खड़ हैं। घमंडी हो गये हैं। होंगे! मुझे नहीं मालूम। मैं उनसे सिर्फ एक बार मिला हूँ। ऊँचा, लम्बा कद। शानदार व्यक्तित्व। मैंने उन्हें देखा तो देखते रह गया। कुछ बोल ही नहीं सका। उनसे औटोग्राफ मांगे। उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरा नाम पूछा और हस्ताक्षर कर दिए। मुलाकात ख़त्म। उन्हें अक्खड़ कहने वाले बताते हैं कि फोन पर नौकरी मांगने पर दिबांग ने ठीक से बात नहीं की। तो क्या करते?

एक और गंभीर आरोप है। कहते हैं कि महिला करमचारियों से उनका व्यवहार ठीक नहीं। मैं बस इतना जानता हूँ कि मरने वाले कि सिर्फ तारीफ होती है और संकट में फंसे आदमी कि सिर्फ बुराई। यह आरोप तब कहाँ थे जब दिबांग पीक पर थे। वैसे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने देखा है कि दिबांग कों आलोचना करने वाले अक्सर उनकी तारीफ ज्यादा कर जाते हैं।

बतंगड़ ब्लॉग में हर्षवर्धन लिखते हैं, 'किसी संपादक को संपादकीय फैसलों से बाहर निकालकर ये कहा जाना कि आप अपना शो देखिए और जो चाहें वो रिपोर्टिंग कर सकते हैं। इसे संपादक की छुट्टी के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है। पता नहीं हो सकता है कि वो दिबांग की मजबूरी ही रही हो कि वो कहीं और छोड़कर नहीं गए। लेकिन, इसी वजह से वो बात हुई जिससे मैं प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकता। दिबांग ने इस मौके का भी पूरा फायदा उठाया और अपने को उस तरह से साबित किया जैसे कोई भी रिपोर्टर नई जगह पर अपने को साबित करता है।
दिबांग के मुकाबला शो की अपनी अलग तरह की पहचान है। जैसे संपादकों के शो होते है, वैसा ही बड़ा शो है। इसलिए इस बारे में कुछ भी कहने का बहुत मतलब नहीं है। लेकिन, दिबांग ने विदर्भ और बुंदेलखंड पर जो, खास खबरों की खबर किया वो, ये बताने के लिए काफी है कि दिबांग अपने संपादक रहते एनडीटीवी के रिपोर्टर्स से जो उम्मीद रखते थे वो, बेवजह नहीं थी। और, अगर कोई संपादक खुद इस स्तर की रिपोर्टिंग कर सकता है तो, उसे पूरा हक है कि वो अपने रिपोर्टर्स से उसी तरह के काम की उम्मीद करे। अच्छा है कि इसी बहाने दिबांग से देश भर से ऐसी रिपोर्ट बना रहे हैं जो, नए-पुराने पत्रकारों के लिए सबक हो सकती है।
दिबांग जिस तरह से रिपोर्टिंग कर रहे हैं उससे मुझे लगता है कि अच्छा हुआ एनडीटीवी में दिबांग की हैसियत कम हो गई। इससे नए पत्रकारों को कम से कम इस बात का अहसास तो होगा कि कोई भी व्यक्ति कितनी काबिलियत के बाद ही संपादक की कुर्सी तक पहुंचता है। वरना तो होता ये है कि कितना भी लायक संपादक हो उसके नीचे या उसके साथ काम करने वालों को कुछ ही दिन में ये लगने लगता है कि इतने लायक तो वो भी हैं। संपादक तो बेवजह कुर्सी पर बैठा ज्ञान पेलता रहता है। '

इससे ज्यादा अब मैं क्या बोलूं। सोना तो सोना होता है। सोने में जंग नहीं लगता। हाँ, आग में जलने के बाद सोना कुंदन बन जाता है। दिबांग पर भी तपिश है। अब इंतज़ार है उनके कुंदन बनने का।


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