यह अँधा कानून है!

>> Tuesday 4 May 2010


मुंबई हमलों (26 /11 ) पर माननीय अदालत का फैसला आ गया। अजमल आमिर कसाब दोषी साबित हुआ. लेकिन न्यायालय ने दोनों भारतीय आरोपियों फहीम अंसारी और सबाउद्दीन अहमद को बरी कर दिया. साल भर सलाखों के पीछे रखने, मीडिया द्वारा उन्हें आंतकवादी करार देने और उनके घरवालों की मिटटी पलीद करने के बाद उन्हें बरी कर दिया. यही बात सबसे ज्यादा चुभती है. अब भले ही वे लोग अगली अदालत से भी छूट जाएँ लेकिन उन पर लगा कलंक कभी नहीं मिट पायेगा. इतना भी होता तो भी खैरियत थी. अफ़सोस! शायद ही वक़्त उनके दिल पर लगे जख्मों पर मरहम लगा पायेगा. उनका आक्रोश भुनाने के लिए लोग तैयार बैठे हैं. कम से कम 'मेरी अल्पविकसित बुद्धि' में यह बात नहीं समाती है की किस विनाह पर निर्दोष लोगों को गिरफ्तार किया जाता है. अदालत में सीबीआई का मज़ाक बन गया. आरोप लगाया गया था कि अंसारी ने रेकी करके हमले के लिए संभावित जगहों का नक्शा बनाया था और इसे नेपाल में सबाउद्दीन को सौंप दिया था। आरोप के मुताबिक, सबाउद्दीन ने इस नक्शे को लश्कर-ए-तोयबा को दिया था। अदालत ने इस कहानी को लगभग हास्यपद करार देते हुए कहा कि जो नक्शा बरामद किया गया है उससे कहीं बेहतर नक़्शे तो गूगल और विकेपेडिया जैसी वेबसाईटोंपर मौजूद हैं. इसके अलावा अगर मुंबई हमलों के मृतक आरोपियों या कसाब से नक्शा बरामद हुआ होता तो यह गन्दा होता, खून से लथपथ होता. इस तरह अदालत ने दोनों के खिलाफ दिए गये सभी सबूत ख़ारिज कर दिए और उन्हें बरी कर दिया. इस मामले में तो फहीम और सलाउद्दीन को एक साल ही काल कोठरी में गुजरना पड़ा. दुर्भाग्य तो यह है कि कई निर्दोष लोगों कि जिंदगी जेल में बिना किसी कसूर के बीत जाती है. अभी हाल ही में लाजपतनगर बम विस्फोट कांड में फैसला आया. उसमें एक कश्मीरी युवक को बरी किया गया. उसे 14 साल पहले दिल्ली के जंगपुरा इलाके से रात तीन बजे पुलिस पकड़ कर ले गयी थी. उस समय वह महज 12 वीं का छात्र था और अपने भाई के पास दिल्ली घूमने आया था. पुलिस न जाने किस आधार पर उसे पकड़ कर ले गयी. 14 साल बाद उसे जेल से रिहा कर दिया गया और कहा गया कि तुम बेगुनाह हो. इस बीच उसके बाप और बहन कि मौत हो गयी. अब वह युवक पागलपन से बदतर हालत में है. बिडम्बना तो यह है कि मीडिया ऐसे मामलों को दरकिनार कर देती है. भला हो इंडियन एक्सप्रेस जैसे चंद अख़बारों का जो अपना फ़र्ज़ आज भी निभा रहे हैं. वरना क्या मालूम कल पुलिस मुझे या आपको भी पकड़ कर ले जाये और फिर कई साल बाद कह दे, 'सॉरी आप निर्दोष हैं'

14 comments:

गुस्ताखी माफ 4 May 2010 at 1:45 AM  

लिखा तो अच्छा है लेकिन आपने शीर्षक में मुसलमान विरोधी शब्द लिखकर कबाड़ा कर दिया. आप इस मामले को किसी धर्म से क्यों जोड़ते हैं? इसे सिर्फ आतंकवाद से ही क्यों जोड़ते हैं?
क्या गैर मुस्लिम निर्दोष नहीं पकड़े जाते?
प्रज्ञा ठाकुर का मामला तो कसाब से काफी पहले का है, उस पर तो मामला सही तरह से चलाया भी नहीं गया.., क्यों?

इसलिये डोगरा महोदय, ये धर्म विशेष का चश्मा उतार कर देखने की कोशिश करें..

pooja sharma 4 May 2010 at 2:04 AM  

लिखा तो अच्छा है लेकिन आपने शीर्षक में मुसलमान विरोधी शब्द लिखकर कबाड़ा कर दिया. आप इस मामले को किसी धर्म से क्यों जोड़ते हैं? इसे सिर्फ आतंकवाद से ही क्यों जोड़ते हैं?

ye to koi baat nhi hui
aap to sirf is baat se khafa hain ki unke saath itna hua aur wo ab bari h
yaha to logo ki jindgi nikal jati hain apne aap ko bekasoor sabit karne me

राज भाटिय़ा 4 May 2010 at 2:50 AM  

इसलिये डोगरा महोदय, ये धर्म विशेष का चश्मा उतार कर देखने की कोशिश करें..

संजय बेंगाणी 4 May 2010 at 4:44 AM  

जेलों में निरापराध लोग सड़ रहे है. कई तो ऐसे हैं जिन पर लगे आरोप की सजा से ज्यादा समय तक जेल में कैद है. बात हिन्दु मुस्लिम की नहीं है. सभी इसको भुगत रहे है.

निर्मला कपिला 4 May 2010 at 12:27 PM  

हाँ धर्म का चश्मा उतार कर ही लिखना चाहिये। नही तो हम सब के साथ इन्साफ नही कर सकते

ओम पुरोहित'कागद' 4 May 2010 at 2:07 PM  

आदमी पहले आदमी है बाद मेँ है किसी धर्म का अनुयायी।इस बात को न समझ पाने से ही कट्टरता पनपती है जो आदमियत के लिए ख़तरनाक है।इसी मेँ से आतंकवाद का मार्ग निकलता है।निर्लेप हो कर लिखो।आपकी कलम मेँ बहुत ताक़त है शायद देश के काम आए!आमीन!

AnuC 10 May 2010 at 2:30 AM  

सच्ची बात..अच्छी बात
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आर्य मनु 27 May 2010 at 4:26 AM  

yaha ek tension hai...agar ek reader likhega ki "आपने शीर्षक में मुसलमान विरोधी शब्द लिखकर कबाड़ा कर दिया. आप इस मामले को किसी धर्म से क्यों जोड़ते हैं?"
to sabhi bas piche pad jayenge usi ek piche....
"लेकिन आपने शीर्षक में मुसलमान विरोधी शब्द लिखकर कबाड़ा कर दिया......ये धर्म विशेष का चश्मा उतार कर देखने की कोशिश करें....हाँ धर्म का चश्मा उतार कर ही लिखना चाहिये।"
are yaar...
aadmi kehna kya chah raha hai...us topic par bhi to jao ....
bas le kar baith gaye ek lathi....

arya manu
9672244094

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देश के हालात सबको रुला रहे हैं..
कुछ आप और हम हैं, बाकी तो भुला रहे हैं . .. बधाई.
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प्रियंक ठाकुर
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प्रदीप कुमार 5 January 2011 at 6:10 AM  

kripya meri kavita padhe aur upyukt raay den..
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DR.MANISH KUMAR MISHRA 4 February 2011 at 6:08 AM  

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'' हिंदी ब्लॉग्गिंग '' पर january २०१२ में आयोजित होनेवाली राष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए आप के आलेख सादर आमंत्रित हैं.इस संगोष्ठी में देश-विदेश के कई विद्वान सहभागी हो रहे हैं.
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के.एम्. अग्रवाल कॉलेज
पडघा रोड,गांधारी विलेज
कल्याण-पश्चिम ,४२१३०१
जिला-ठाणे
महाराष्ट्र ,इण्डिया
mailto:manishmuntazir@gmail.com
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०९३२४७९०७२६

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