वेलेंटाइन डे: मुझे बिहार से हुआ प्यार!

>> Monday 14 February 2011

पत्रकारिता के सबक सीखने जब मैं दिल्ली रहने आया था तो मैंने पहली बार देखा था कि बिहारी लोग रेहड़ी- खोमचे वालों के अलावा भी होते हैं। हिमाचल छोड़ कर जाते समय मुझे घर से एक ही ताकीद मिली थी। घरवालों ने मुझे किसी बुरी आदत से बचने के लिए नहीं कहा। जो भी मिला उसने कहा बस बिहारियों से दूर रहना। लेकिन मैनें यहां आकर बिहारी को रूममेट बना लिया। वजह बस इतनी थी कि और कोई मिला ही नहीं। उस समय तक पढ़े- लिखे बिहारी मैंने सिर्फ टीवी पर देखे थे। यहीं पता चला राजनीति के प्रति आम लोग किस हद तक जागरूक होते हैं। हमारे यहां तो राजनीति का मतलब वोट देने और दो -चार दूसरी चीजों से ही होता है। उस समय बिहार की छवि बहुत खराब थी।
अभी पिछले कुछ दिन पहले बिहार जाने का मौका मिला। घर वाले फिर छेड़ने लगे कि संभल कर जाना। मेरे रूममेट की शादी थी इसलिए मैं जाना चाहता था। वरना मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि इतनी जल्दी बिहार जांऊगा। मेरे साथ एक और सज्जन थे जो बिहारी ही थे। एक और बात। हिमाचली होने के नाते मुझे ट्रेन से ल�बी दूरी की यात्रा का भी अनुभव नहीं था। हमारे यहां छोटी रेलगाड़ी होती है जो बस से भी धीरे चलती है।
नई दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन पकड़ी। कहने को सीट आरक्षित थी लेकिन पहले से और लोग उस पर काबिज हो चुके थे। हमारी एक सीट उपरी बर्थ की भी थी जो खाली थी। हम दोनों उस पर बैठ गए। बरेली तक ऐसे ही चला। सामने वाली सीट पर भी कुछ लोग बिना आरक्षित सीट के बैठे हुए थे। उनमें एक युवक बिहार से था। एक सज्जन उसे छेड़ते हुए बोले, "लखनऊ तक तो तुम अपनी सीट भी छोड़ दोगे।" बात मुझे समझ नहीं आई। मेरे साथी ने खुलासा किया कि लखनऊ से ही भोजपुरी बाहुल्य क्षेत्र शुरू हो जाता है।
संयोग कहिए या कुछ और। लखनऊ में नजारा दिख ही गया। अभी कुछ देर पहले अपनी सीटों पर हक जता कर यात्री सोये ही थे कि लखनऊ आ गया। जैसे ही ट्रेन रूकी धड़ाधड़ सैंकड़ों युवक ट्रेन में घुस गए। तिल धरने की भी जगह नहीं बची। पता नहीं उतरने वालों का क्या हुआ। मैं ऊपरी बर्थ पर सो रहा था। एक युवक मेरी सीट पर चढ़ आया। मैंने रोकने की कोशिश की लेकिन मुझे भी पता था कि यह असम्भव है। सारी ट्रेन में (कम से कम जहां तक मैं देख सकता था) मैं अकेला था जिसने उन घुसपैठियों का विरोध किया। बाकी सबने बिना कुछ कहे नए मेहमानों को शरण दे दी।
मैं सो रहा था। मेरे पांवों के पास एक युवक बैठा था। धीरे-धीरे एक और युवक मेरे बगल में घुस आया। मैंने सहर्ष उसे सोने के लिए जगह दे दी। फिर पता चला कि लखनऊ में यूनियन बैंक में नौकरी के लिए कोई परीक्षा थी। यह सब युवक पटना जाने वाले थे। हमें बक्सर तक ही जाना था। इसलिए बाकी का सफर आरामदायक तो नहीं था लेकिन मनोरंजन भरा था। ऐसे में मुझे बापू गांधी की बात याद आ गई कि भारत देखना है तो रेलगाड़ी के दूसरे दर्जे में ही यात्रा करें। मैं कहूंगा कि स्लीपर भी उचित विकल्प है। सूर्य उगने से पहले हम ट्रेन से उत्तर चुके थे। जल्दी ही लाल सूरज हमारा स्वागत करने लगा।
गांवों से होते हुए मैं अपने दोस्त के घर जा रहा था। बिहार के गांवों को देखकर बचपन की याद आ गई। मैंने हिमाचल में आखिरी बार तालाब दस-बारह साल पहले देखा था। अब तो उसके निशान भी नहीं दिखाई पड़ते। लेकिन यहां बिहार में हर दो मिनट बाद एक तालाब दिखाई पड़ता था। यहां लोगों ने इतना प्यार दिया कि मैं कभी सोच भी नहीं सकता था। दिल्ली में रहते हुए धारण बन गई थी कि बिहारी चतुर, शातिर, चालबाज और राजनीति करने वाले होत हैं। यहां आकर अपनी सोच पर दया आई। लोग बेहद शरीफ, भोले और सरल थे। बापू गांधी की आत्मकथा में एक शीर्षक है 'बिहारी सरलता'। जब पढ़ा था तो हंसी आई थी। यहां देखा तो आंसू आ गए।
शादी में नाच मण्डली देखी। यह मेरे लिए बिल्कुल नई चीज थी। वापस लौटने तक मुझे बिहार से प्यार हो गया। दरअसल बिहार की खराब छवि के लिए बिहारी लोग ही जिम्मेदार हैं। उन्होंने बिहारी शब्द को शर्म का विषय मान लिया है। इसके विपरीत हमें कोई पहाड़ी या हिमाचली कहता है तो गर्व होता है। जब मैं जा रहा था तो ट्रेन में बिहारी लोगों बात हुई। मैंने बताया कि बिहार देखने जा रहा हूं। उनके भाव ऐसे थे कि क्या बिहार भी देखने लायक चीज है क्या? मैं कहता हूं बिहार प्यार करने लायक चीज है।

22 comments:

डॉ० डंडा लखनवी 14 February 2011 at 9:40 AM  

जानदार और शानदार प्रस्तुति हेतु आभार।
=====================
कृपया पर्यावरण संबंधी इस दोहे का रसास्वादन कीजिए।
==============================
गाँव-गाँव घर-घ्रर मिलें, दो ही प्रमुख हकीम।
आँगन मिस तुलसी मिलें, बाहर मिस्टर नीम॥
-------+------+---------+--------+--------+-----
शहरीपन ज्यों-ज्यों बढ़ा, हुआ वनों का अंत।
गमलों में बैठा मिला, सिकुड़ा हुआ बसंत॥
--------------+--------------+------------
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

Poorviya 20 February 2011 at 6:51 AM  

bilkul sahi kaha---
jai baba banaras

धान के देश में 23 February 2011 at 10:55 AM  

आज से कुछ साल तक बिहार की स्थिति वाकई काफी खराब थी। अब तो हमें बिहारी कहने पर गर्व होता है। धन्‍यवाद

Ajayendra Rajan 15 March 2011 at 6:28 AM  

badhia tha...agey bhi aise sansmaran likhtey rahein

प्रदीप कुमार 13 April 2011 at 1:03 AM  

kripya meri kavita bhi padhe
www.pradip13m.blogspot.com

deepika sharma (cartoonist) 15 April 2011 at 3:54 AM  

trully bihari log bhut achae or sachae hotae hai dil kae. fir janae kyu vo khud ko bihari kehlvanae mai sharmatae hai but i also want to see bihar ......and i like ur artical so much ........

Vaneet Nagpal 14 August 2011 at 3:03 AM  

सुनील डोगरा जी,
नमस्कार,
आपके ब्लॉग को सिटी जलालाबाद डाट ब्लॉगस्पोट डाट कॉम के "हिंदी ब्लॉग लिस्ट पेज पर लिकं किया जा रहा है |

Putu Cenik Budi Dharma Yoga 27 February 2014 at 5:11 AM  

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Jain Nath 15 March 2014 at 8:35 PM  

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Vinay Singh 26 May 2014 at 4:21 AM  

हैल्थ बुलेटिन की आज की बुलेटिन स्वास्थ्य रहने के लिए हैल्थ टीप्स इसे अधिक से अधिक लोगों तक share kare ताकि लोगों को स्वास्थ्य की सही जानकारिया प्राप्त हो सकें।

Indu singh 7 July 2014 at 11:53 AM  

प्रस्तुति जानदार और शानदार है। Best Hindi Suvichar

pukhraaj 8 September 2014 at 8:29 PM  

Pahali bar apke blog par ayi , Bihar ke Naye roop ke darshan hue . ye khasiyat Waha rahne walo ki to ho sakti hai Magar Bihar rajniti se chalta hai ... Bihar ka chota bhai U. P. Bhi to hai use hum Bhool nahi skate rajniti ke Mamle me .. Fir bhi Kuch alag Padhna acha laga.

सुशील कुमार जोशी 25 October 2014 at 8:26 AM  

सुंदर संस्मरण सुंदर अभिव्यक्ति ।

Vinay Singh 10 December 2014 at 2:33 AM  

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